
‘ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्’—माण्डूक्य उपनिषद् का यह प्रथम और अमर निर्देश साक्षात् यही उद्घोष करता है कि यह जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, जो भूत, भविष्य और वर्तमान के चक्र में गतिमान है, और जो इन तीनों कालों की सीमाओं से परे है, वह सब कुछ केवल और केवल ओंकार ही है। इसलिए यह कहना तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ओंकार ही जीवन है।
ओंकार केवल एक ध्वनि या शब्द नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और हमारी जैविक सत्ता का आदि एवं ब्रह्माण्डीय स्पन्दन (Cosmic Resonance) है। यदि हम इसे आधुनिक जीवविज्ञान के चश्मे से देखें, तो जीवन की परिभाषा ही स्पन्दन और सूचना का अनवरत प्रवाह है। एक जीवित कोशिका और एक मृत कोशिका में भौतिक रूप से सब कुछ समान होते हुए भी केवल उस मौलिक स्पन्दन और ऊर्जा के प्रवाह का ही अन्तर होता है।
सृष्टि का प्रत्येक कोशिकीय स्पन्दन, हमारे डीएनए की संरचना और तन्त्रिका-तन्त्र में बहने वाली विद्युत-रासायनिक तरंगें उसी मौलिक ब्रह्माण्डीय आवृत्ति के अनुरूप कार्य कर रही हैं, जिसे हमारे ऋषियों ने ‘ॐ’ के रूप में अनुभूत किया था। हमारे भीतर जो आनुवंशिक कूट (Genetic Code) निरन्तर जीवन की रचना कर रहे हैं, उनका ताना-बाना भी निश्चित आणविक कम्पनों पर आधारित है। यह ओंकार हमारी कोशिकाओं के भीतर निहित उस जैविक बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, जो जीवन के सातत्य और होमियोस्टैसिस को बनाए रखती है। इस प्रकार उपनिषद् के निर्देशपरक प्रकाश में संस्कृत का लालित्य और कोशिकीय जीवविज्ञान का अन्तर्सम्बन्ध एक अखण्ड प्रवाह बनकर उभरता है।
माण्डूक्य उपनिषद् का प्रत्येक पद हमारी दैनिक जीवनचर्या और अस्तित्व के रहस्यों को समझने का एक निर्देश है, जो ओंकार के इन्हीं चरणों के माध्यम से प्रकट होता है। इस यात्रा का प्रथम चरण हमारी जाग्रत अवस्था है, जिसे उपनिषद् वैश्वानर कहता है। इसके लिए श्रुति निर्देश देती है—
‘जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा’
(माण्डूक्य उपनिषद्, 9)
यह अवस्था ओंकार के प्रथम अक्षर ‘अ’—अकार से संचालित है। इसके सन्दर्भ में आदि शंकराचार्य आगमप्रकरण के मंगलाचरण में कितनी सूक्ष्मता से लिखते हैं—
‘प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकरव्यापिभिर्व्याप्य लोकान्
भुक्त्वा भोगान् स्थविष्ठान्।’
जब हम सुबह अपनी आँखें खोलते हैं, तो हमारी ज्ञान-रश्मियाँ दसों दिशाओं में फैलकर इस चर-अचर संसार को अपने भीतर समेटने लगती हैं। जैविक दृष्टिकोण से देखें तो यह हमारे तन्त्रिका-तन्त्र की वह सक्रिय अवस्था है, जिसमें न्यूरोट्रांसमीटर और संवेदी रिसेप्टर्स बाहरी उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं।
‘अ’ की यह ध्वनि आरम्भ, विस्तार और बहिर्मुखी चेतना का प्रतीक है। यह हमारे भीतर की कोशिकीय बुद्धिमत्ता और चेतना की किरणों को बाहर की ओर प्रसारित करती है। उपनिषद् निर्देश देता है कि जिसे हम ‘बाहरी संसार’ समझकर स्वयं को उससे अलग मान बैठे हैं, वह वास्तव में इसी ‘अ’ के स्थूल विस्तार के रूप में अनुभूत होता है। जाग्रत अवस्था में ही जीव भौतिक रूप से देश, काल और रैखिक समय (Linear Time) का बोध करता है।
जैसे ही दिन ढलता है और हम रात्रि के विश्राम की ओर बढ़ते हैं, उपनिषद् हमें ओंकार के दूसरे चरण में प्रवेश कराता है—हमारी स्वप्नावस्था। श्रुति कहती है—
‘स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः… तैजसो द्वितीयः पादः’
(माण्डूक्य उपनिषद्, 4)
यही अवस्था ओंकार के दूसरे अक्षर ‘उ’—उकार का प्रतीक है—
‘स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रा।’
(माण्डूक्य उपनिषद्, 10)
इसके विस्तार में मंगलाचरण कहता है—
‘पश्चाच्चान्यान् स्वमतिविभवान् ज्योतिषा स्वेन सूक्ष्मान्।’
यहाँ विज्ञान और दर्शन का एक अत्यन्त विस्मयकारी रहस्य उद्घाटित होता है। जाग्रत अवस्था में हमारी इन्द्रियाँ जिस बाहरी संसार, निश्चित स्थान और रैखिक समय का अनुभव करती हैं, स्वप्नावस्था में प्रवेश करते ही वह पूरा भौतिक ढाँचा विलीन हो जाता है। उस समय सूर्य, चन्द्रमा या दीपक जैसी बाहरी ज्योतियों के अभाव और इन्द्रियों के शान्त होने पर भी जीव अपने ही आन्तरिक प्रकाश—‘ज्योतिषा स्वेन’—से स्मृतियों, आकांक्षाओं और कल्पनाओं का नया देश और नया समय रच लेता है।
न्यूरोबायोलॉजी की भाषा में स्वप्नों का गहरा सम्बन्ध प्रायः REM sleep से होता है, जिसमें बाहरी संवेदी सम्पर्क सीमित होने पर भी मस्तिष्क के अनेक क्षेत्र सक्रिय रहते हैं। स्वप्न का अपना एक अलग अनुभवगत space-time continuum होता है, जहाँ कुछ ही मिनटों की जैविक घड़ी में वर्षों की यात्रा का अनुभव हो सकता है।
यह हमें संकेत देता है कि देश, काल और समय का हमारा अनुभव चेतना की अवस्था से गहरे रूप से जुड़ा हुआ है। उपनिषद् का यह ‘अन्तःप्रज्ञः’ निर्देश समझाता है कि जैसे ही चेतना अन्तर्मुखी होती है, अनुभव-जगत का स्वरूप बदल जाता है और जीव अपने भीतर के सूक्ष्म विभव का रसास्वादन करने लगता है।
इसके बाद उपनिषद् हमें ओंकार के तीसरे अक्षर की ओर ले जाता है, जहाँ सब कुछ विलीन हो जाता है और जिसे हम सुषुप्ति या प्राज्ञ अवस्था कहते हैं। इसके लिए उपनिषद् का निर्देश है—
‘सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा।’
(माण्डूक्य उपनिषद्, 11)
इसके लिए आचार्य कहते हैं—
‘पीत्वा सर्वान् विशेषान् स्वपिति मधुरभुङ् मायया भोजयन्नः।’
इस अवस्था में न कोई विशिष्ट इच्छा बचती है और न कोई दृश्य। जैसे ‘अ’ और ‘उ’ अन्त में ‘म’—मकार—में जाकर सिमट जाते हैं, वैसे ही अनुभवों की विविधता घनीभूत प्रज्ञान में विलीन हो जाती है।
जैविक दृष्टि से यह अवस्था गहरी Non-REM sleep से सम्बद्ध समझी जा सकती है, जिसमें मस्तिष्क की विद्युत् गतिविधि धीमी तरंगों की ओर जाती है और शरीर में मरम्मत, ऊर्जा-सन्तुलन तथा अनेक पुनर्स्थापन प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं। उपनिषद् यहाँ निर्देश करता है कि जीव समस्त भेदों और विशेषणों को छोड़कर ‘म’ के सम्पुट में गहन विश्राम और आनन्द का आस्वादन करता है। यही कोशिकीय शान्ति और गहरा विश्राम हमारे जैविक तन्त्र को पुनर्जीवित करते हैं।
इस गहरे भाष्य के उपरान्त, जब हम ओंकार के व्यावहारिक और ध्वन्यात्मक पक्ष को देखते हैं, तो यह अन्तःकरण और शरीर-क्रिया विज्ञान को प्रभावित करने वाली ध्यान-पद्धति के रूप में उभरता है। अ, उ और म का सजग उच्चारण श्वास, ध्यान, ध्वनि और शरीरगत कम्पन को एक लय में जोड़ता है।
‘अ’ का स्पन्दन शरीर के निचले और मध्य भागों में अनुभव किया जा सकता है। ‘उ’ का स्पन्दन वक्ष और कण्ठ के क्षेत्र में लय स्थापित करता है। अन्त में, जब हम होंठों को बन्द करके ‘म’ का उच्चारण करते हैं, तो उसका नासिकीय गुंजन सिर और मुख के भीतर स्पष्ट अनुनाद उत्पन्न करता है।
धीमा उच्चारण, दीर्घ श्वास और ध्वनि पर एकाग्रता स्वायत्त तन्त्रिका-तन्त्र को शान्त करने, श्वास की गति कम करने और मानसिक तनाव घटाने में सहायक हो सकते हैं। ओंकार का प्रभाव केवल ध्वनि में नहीं, बल्कि ध्वनि, श्वास, ध्यान और मौन की संयुक्त प्रक्रिया में निहित है।
अन्त में उपनिषद् इन तीनों अक्षरों से परे ओंकार के उस चतुर्थ स्वरूप का उद्घाटन करता है, जो अमात्र—ध्वनि के समाप्त हो जाने के बाद का मौन—और तुरीय है—
‘अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैतः।’
(माण्डूक्य उपनिषद्, 12)
इसके सन्दर्भ में मंगलाचरण स्पष्ट करता है—
‘मायासंख्यातुरीयं परममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि।’
तथा—
‘हित्वा सर्वान् विशेषान् विगुणगुणः पात्वसौ नस्तुरीयः।’
यहाँ उपनिषद् की पहली अमोघ कड़ी—
‘यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव’
—साक्षात् जीवन्त हो उठती है। तुरीय जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के बाद आने वाली कोई चौथी सामान्य मानसिक अवस्था नहीं है; वह इन तीनों अवस्थाओं में निरन्तर उपस्थित उस साक्षी-चेतना का संकेत है, जो स्वयं किसी एक अवस्था में सीमित नहीं होती।
आचार्य शंकर इस मंगलाचरण में किसी सुदूर देवता को नहीं, बल्कि अजन्मा, अविनाशी और सर्वव्यापक ब्रह्म को प्रणाम करते हैं। जब वे कहते हैं—
‘परममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि’
—तो जीवन-विज्ञान के धरातल पर हम उसमें जैविक सातत्य का एक रूपक भी देख सकते हैं। कोशिकाओं के भौतिक शरीर जन्म लेते और नष्ट होते रहते हैं, किन्तु जीवन की धारा आनुवंशिक सूचना, प्रजनन और पीढ़ियों के सातत्य के माध्यम से आगे बढ़ती रहती है।
जैविक सातत्य दार्शनिक अमरत्व का प्रमाण नहीं, किन्तु जीवन की उस अखण्ड प्रवाहशीलता का शक्तिशाली प्रतीक अवश्य है जो व्यक्तियों के परिवर्तन के बीच भी बनी रहती है। इसी प्रकार ‘अमात्र’ उस मौन का प्रतीक बनता है जो ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ को सम्भव बनाता है, पर स्वयं किसी एक ध्वनि में सीमित नहीं होता।
जैसे-जैसे जीवन अपनी पूर्ण परिपक्वता की ओर बढ़ता है, वैसे-वैसे हमारे भीतर की जैविक घड़ी भी विश्राम की ओर अग्रसर होती है। उम्र के साथ शरीर, संवेदनशीलता, हार्मोन और तन्त्रिका-प्रक्रियाओं में स्वाभाविक परिवर्तन आते हैं। इन परिवर्तनों को केवल शिथिलता के रूप में देखने के बजाय जीवन की गति के रूपान्तरण के रूप में भी समझा जा सकता है।
जब बाहरी उद्दीपनों का आकर्षण कम होने लगता है, तब सांसारिक राग-द्वेष और उथल-पुथल से एक स्वाभाविक दूरी सम्भव होती है। विज्ञान की दृष्टि से यह जैविक परिपक्वता है; दर्शन की दृष्टि से यही विरक्ति, आत्मावलोकन और सहज मुक्ति का द्वार बन सकती है।
तब ओंकार का शान्त, अमात्र और तुरीय स्वरूप किसी दूरस्थ आध्यात्मिक अवधारणा की तरह नहीं, बल्कि जीवन की बदलती अवस्थाओं के पीछे उपस्थित मौन साक्षी के रूप में अनुभव होने लगता है। जीव इस अवस्था को केवल अभाव नहीं, बल्कि गहरे आत्मिक विश्राम और आन्तरिक स्वतंत्रता के रूप में देख सकता है।
उपनिषद् का अन्तिम निर्देश यही है कि हम स्वयं को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी बदलती अवस्थाओं तक सीमित न मानें, बल्कि उस सदा उपस्थित, अमात्र, अव्यवहार्य और प्रपञ्चोपशम तुरीय स्वरूप को पहचानें।
वही बदलती हुई जीवन-ध्वनियों के पीछे का मौन है, वही चेतना का आधार है, और वही हमारा वास्तविक स्वरूप है।
— डॉ. अशोक तिवारी एवं प्रो. अरुण तिवारी
ॐ : जीवन का ब्रह्माण्डीय स्पन्दन