सिद्धार्थ से बुद्ध: ‘खोज’ के विसर्जन से ‘बोध’ के उदय तक
सृष्टि के अनंत विस्तार में ‘अस्तित्व’ स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए निरंतर नए स्वरूपों की खोज करता है। जिसे ‘इतिहास’ कहा जाता है, वह केवल उन लोगों का संग्रह है जो कुछ ‘बनने’ की दौड़ में सफल हुए; लेकिन जो ‘होने’ की अवस्था में प्रतिष्ठित हो गए, वे इतिहास से ऊपर उठकर ‘बोध’ बन गए।
सिद्धार्थ गौतम की यात्रा भी किसी गंतव्य तक पहुँचने की नहीं, बल्कि उस ‘अव्यक्त’ को अपने भीतर ‘व्यक्त’ करने की गाथा है। वे महल से किसी पद की लालसा में नहीं, बल्कि जीवन के दुःख की जड़ खोजने निकले थे। किंतु इस खोज में भी एक सूक्ष्म ‘मैं’ जीवित था, जो कठोर प्रयासों से उत्तर पाना चाहता था। यही सूक्ष्म ‘कर्ता’ भाव मनुष्य को भीड़ का हिस्सा बनाए रखता है, क्योंकि वहाँ सदैव कुछ पाने के लिए एक अंतहीन और दिशाहीन दौड़ जारी रहती है।
इसी उत्तर की व्याकुलता ने उन्हें प्रकृति की उन कठोर परिस्थितियों के बीच ला खड़ा किया, जहाँ सत्य का सामना किसी शास्त्र से नहीं, बल्कि सीधे अस्तित्वगत संघर्ष से होना था। सिद्धार्थ प्रखर मेधा के धनी थे। उन्होंने उस समय के उपलब्ध समस्त ज्ञान-विज्ञान, तर्कशास्त्र, कठिन योग-नियम और जटिल आसनों को न केवल सीखा, बल्कि उनमें पूर्ण दक्षता प्राप्त कर ली थी।
वे अलार कलाम और उद्रक रामपुत्र जैसे उस समय के महानतम गुरुओं के पास गए और वह सब कुछ सीख लिया जो वे सिखा सकते थे। फिर भी, वे जिस ‘दुःख के निवारण’ की खोज में निकले थे, वह इन सभी प्रणालियों और संचित ज्ञान के पार था। वे सब कुछ जानकर भी ‘उस’ एक सत्य से वंचित थे, जो बुद्धि की पकड़ में नहीं आता, क्योंकि उनकी मेधा अभी भी ‘प्रयास’ और ‘खोज’ के दायरे में बंधी थी।
अति-प्रयास और सूचनाओं का संचय अक्सर अनुभव के उन सूक्ष्म द्वारों को बंद कर देता है जिन्हें केवल पूर्ण मौन ही खोल सकता है। सिद्धार्थ का यह अनुभव सिद्ध करता है कि संचित ज्ञान, जब तक अनुभव की अग्नि में न तपे, केवल मस्तिष्क का बोझ बना रहता है।
यही वह निर्णायक मोड़ था जहाँ उनकी मेधा ने उन्हें ज्ञान के संचय से हटाकर अस्तित्व के सीधे और नग्न अनुभव की ओर धकेल दिया—जिसका चरम पड़ाव निरंजना नदी का वह तट बना।
इस महायात्रा का सबसे गहन और वैज्ञानिक पड़ाव निरंजना नदी का वह तट था, जहाँ सिद्धार्थ का संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर था। वर्षों की कठोर तपस्या और शरीर को गला देने वाली साधना के पश्चात सिद्धार्थ उस बिंदु पर खड़े थे जहाँ ‘प्रयास’ स्वयं दम तोड़ रहा था
आधुनिक युग के आध्यात्मिक चिंतक सद्गुरु जग्गी वासुदेव इस रूपांतरण को एक नई वैज्ञानिक दृष्टि देते हुए स्पष्ट करते हैं कि सिद्धार्थ का बुद्ध होना वास्तव में ‘प्रयास की सीमा’ का अंत था। जब सिद्धार्थ ने अपनी समस्त मानवीय ऊर्जा झोंक दी और फिर भी कुछ न मिला, तब उस परम ‘हताशा’ में ही वह द्वार खुला जिसे हम ‘समर्पण’ कहते हैं।
सिद्धार्थ का शरीर उस समय केवल एक जर्जर पिंजरा मात्र रह गया था, जिसकी पसलियाँ बाहर से गिनी जा सकती थीं। जब वे निरंजना की जलधारा को पार करने के लिए उतरे, तो वह प्रवाह जो किसी सामान्य जीव के लिए नगण्य था, सिद्धार्थ के लिए एक दुर्लंघ्य महासागर बन गया।
एक सूखी टहनी को पकड़कर जल के बीचों-बीच घंटों खड़े रहना और उस प्रवाह के थपेड़ों को सहना, वास्तव में उस ‘खोजने वाले’ के अहंकार की अंतिम हार थी। यह ‘अहंकार की हार’ ही वह अनिवार्य वैज्ञानिक शर्त है जहाँ से ‘साक्षी’ भाव का उदय होता है।
जब तक कर्ता जीवित है, तब तक केवल संघर्ष है; जब कर्ता गिर जाता है, तब वह शक्ति प्रवाहित होती है जिसे हम चैतन्य कहते हैं।
उसी क्षण, जब मृत्यु और जीवन के बीच की रेखा धूमिल हो रही थी, सिद्धार्थ को उस मर्मभेदी सत्य का भान हुआ जिसने उनकी खोज की दिशा ही समूल बदल दी। उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया कि वह किसकी खोज में हैं और क्या दुःख जीवन से अलग है।
उस बहती जलधारा में काँपते हुए सिद्धार्थ ने जाना कि जिसे अब तक त्यागा जा रहा था, वही तो मंदिर है। वह ‘जीवन’ जिसे वे एक समस्या मानकर सुलझाने निकले थे, वह स्वयं में ही समाधान था।
यह शरीर वास्तव में उस ‘ब्रह्म’ की अभिव्यक्ति का ‘जैविक यंत्र’ है। यह यंत्र ही वह एकमात्र प्रयोगशाला है जहाँ सत्य का परीक्षण होना है; इसे कष्ट देकर या नष्ट करके सत्य को पाना संभव नहीं है। शरीर की उपेक्षा करना वास्तव में उस चेतना की उपेक्षा करना है जो इसके माध्यम से स्वयं को प्रकाशित कर रही है।
यंत्र की महत्ता का यही साक्षात्कार उन्हें हठयोग की सीमाओं से निकालकर चेतना के उस संतुलन की ओर ले गया जिसे जगत ने ‘मध्यम मार्ग’ कहा।
यह बोध सिद्धार्थ को ‘अति’ के कोलाहल से निकालकर ‘मध्यम मार्ग’ की ओर ले गया। यह कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि ‘मेधा’ का उदय था जिसने सिद्धार्थ को यह समझाया कि सत्य न तो भोग की विलासिता में है और न ही देह को दंड देने वाले त्याग में। सत्य तो उस ‘होने’ में है, जो इन दोनों छोरों के बीच एक गहन शांति में खड़ा है।
उन्हें स्पष्ट हो गया कि जीवन से भागकर सत्य को पाना संभव नहीं, क्योंकि जीवन ही सत्य का साक्षात् नृत्य है। यही ‘ठहर जाना’ वास्तव में वह आंतरिक क्रांति है जो एक साधारण मनुष्य को बुद्धत्व की ओर मोड़ देती है।
जब व्यक्ति की भागदौड़ शांत होती है, तभी वह उस संगीत को सुन पाता है जो अस्तित्व हर क्षण बजा रहा है
नदी के उस पार पहुँचकर सिद्धार्थ ने उस ‘पाने’ के संकल्प को ही विसर्जित कर दिया जिसने उन्हें वर्षों से अशांत रखा था। सुजाता के हाथों खीर ग्रहण करना केवल भोजन करना नहीं था, बल्कि अस्तित्व के साथ पुनः जुड़ने का एक उत्सव था।
उस रात वटवृक्ष के नीचे जो घटित हुआ, वह किसी बाहरी ईश्वरीय शक्ति का वरदान नहीं था, बल्कि वह ‘अद्वैत’ का अपने ही स्वरूप को पहचान लेना था।
जब ‘मैं खोज रहा हूँ’ का भाव पूर्णतः शांत हुआ, तो पीछे जो बचा वह ‘बुद्ध’ था। बुद्ध कोई नाम नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ ‘स्व’ और ‘सर्व’ की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। बुद्धत्व का अर्थ ही है—खोजने वाले का खो जाना और जो शेष बचा है उसका विराट के साथ एकाकार हो जाना।
बुद्धत्व की इस पूरी यात्रा का निचोड़ ‘अप्प दीपो भव’ के सूत्र में समाहित है। यह केवल एक दार्शनिक उपदेश नहीं, बल्कि अद्वैत का विज्ञान है जो हर मनुष्य को उसके अपने ‘गर्भ-गृह’ की ओर मोड़ देता है।
बुद्ध ने स्पष्ट किया कि बाहर की कोई भी प्रतिमा, कोई भी अवतार या कोई भी शास्त्र वह सत्य नहीं दे सकता जो भीतर पहले से ही ‘अव्यक्त’ रूप में विद्यमान है। मंदिर के ‘शिखर’ और ‘गर्भ-गृह’ के बीच की दूरी को केवल ‘अपना प्रकाश’ बनकर ही तय किया जा सकता है।
यह आंतरिक प्रकाश ही वह विज्ञान है जो व्यक्ति को भीड़ की मानसिकता से अलग कर उसकी अपनी मौलिक मेधा में प्रतिष्ठित करता है।
आज जब सूचनाओं और एल्गोरिदम का युग है, तो बुद्ध का यह ‘वैज्ञानिक आध्यात्म’ और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह याद दिलाता है कि चाहे सूचनाओं का कितना ही बड़ा कोलाहल क्यों न हो, शांति और सत्य केवल वहीं मिलेंगे जहाँ ‘मैं’ का विसर्जन होता है और अस्तित्व अपने शुद्धतम रूप में प्रकाशित होता है।
कृत्रिम मेधा सूचना दे सकती है, लेकिन ‘बोध’ केवल भीतर की मौन प्रयोगशाला में ही घटित होता है। सिद्धार्थ का बुद्ध होना मानवता के लिए वह प्रकाश-स्तंभ है, जो हर राहगीर को अपनी ही भीतर की ज्योति खोजने का साहस और वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करता है।
बिना थके उस ‘विश्राम’ का आनंद कहाँ? जिसने कभी श्रम नहीं किया, उसके लिए विश्राम केवल आलस्य है, बोध नहीं। सिद्धार्थ की वर्षों की थकान ही थी, जिसने उस वटवृक्ष की छाया को एक दिव्य विश्राम में बदल दिया।
सिद्धार्थ का वापस लौटकर लोगों के बीच आना यह सिद्ध करता है that आत्मबोध संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी उससे अलिप्त हो जाना है। वे बाजार में भी वैसे ही शांत थे जैसे वटवृक्ष के नीचे।
उनका शिष्यों के साथ रहना और उन्हें मार्ग दिखाना यह प्रमाणित करता है कि जब भीतर का दीपक जल गया है, तो बाहर का अंधकार या शोर उसे प्रभावित नहीं कर सकता। यह ‘होने’ की यात्रा हमें अपनी जिम्मेदारियों और इस आधुनिक जगत के बीच रहते हुए भी उस ‘केंद्र’ को न खोने का साहस देती है।
‘_पाने’ की थकन छोड़कर जब ‘होने’ का बोध जगाया,
सिद्धार्थ ने अपने ही भीतर, उस बुद्ध को पाया_।
डॉ. अशोक तिवारी