इसी उत्तर की व्याकुलता ने उन्हें प्रकृति की उन कठोर परिस्थितियों के बीच ला खड़ा किया, जहाँ सत्य का सामना किसी शास्त्र से नहीं, बल्कि सीधे अस्तित्वगत संघर्ष से होना था। सिद्धार्थ प्रखर मेधा के धनी थे। उन्होंने उस समय के उपलब्ध समस्त ज्ञान-विज्ञान, तर्कशास्त्र, कठिन योग-नियम और जटिल आसनों को न केवल सीखा, बल्कि उनमें पूर्ण दक्षता प्राप्त कर ली थी।