इस भौतिक रूपांतरण के मध्य ब्रह्मांड में केवल एक ही तत्व ऐसा है जिसका कभी क्षय नहीं होता, और वह है 'सूचना' (Information) अथवा 'सत्व'। जैविक स्तर पर देखें तो किसी जीव का भौतिक शरीर भले ही नष्ट हो जाता है, किंतु उसके जीवन के अनुभव और जैविक डेटा उसकी आने वाली पीढ़ियों में डीएनए (DNA) के वंशानुगत सूत्रों के भीतर 'सत्व के कोश' के रूप में निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं। इसी प्रकार, समष्टिगत स्तर पर मनुष्य के नाम और भौतिक पहचान भले ही ओझल हो जाएं, किंतु उनकी चेतना का सत्व अमर रहता है। जब हम पृथ्वी के गर्भ से निकले प्राचीन भग्नावशेषों को देखते हैं, तो उनका भौतिक वैभव मौन हो चुका होता है, किंतु उनके भीतर समाहित मानवीय मेधा आज भी जीवंत दिखाई देती है। मिट्टी में दबे वे खंडहर इस बात के सुंदर प्रमाण हैं कि समय भले ही भौतिक आकारों को अपरिवर्तित रखने के लिए उत्तरदायी न हो, किंतु वह उस 'सत्व' को पूरी निष्ठा से सुरक्षित रखता है जो समष्टिगत चेतना के विकास में सहायक होता है। जब किसी ऐतिहासिक सभ्यता का उत्खनन होता है, तो काल केवल उसके मलबे को नहीं दिखाता, बल्कि उस युग के विज्ञान, जीवन-शैली, नगर-नियोजन और सामूहिक बुद्धिमत्ता को उजागर करता है।