सत्व का अमरत्व
जब हम इतिहास के विस्तृत फलक पर दृष्टिपात करते हैं, तो समय एक निरपेक्ष, निष्पक्ष और तटस्थ साक्षी के रूप में खड़ा दिखाई देता है। काल के इस अनवरत प्रवाह में न तो किसी के प्रति विशेष अनुराग है और न ही कोई द्वेष; इसका वेग बेबाक है और इसका निर्णय अपरिवर्तनीय। अपनी इस पार्थिव यात्रा में मनुष्य अक्सर अपने युग के अनुभवों, कला और मेधा को भौतिक आकारों के माध्यम से सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। वह पत्थरों पर शिलालेख उत्कीर्ण करता है, ऊँचे प्राचीर बनाता है और भव्य स्मारकों का निर्माण करता है, ताकि वर्तमान की समझ को भविष्य के लिए सुरक्षित किया जा सके। किंतु, ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का मूलभूत नियम यह स्पष्ट करता है कि ब्रह्मांड का प्रत्येक भौतिक आकार और संरचना अंततः रूपांतरण और अवस्था-परिवर्तन के लिए बाध्य है। समय का नियम अत्यंत सरल और पारदर्शी है—जो कुछ भी एक सीमित आकार में प्रकट हुआ है, उसे एक दिन बिखरना ही है और अपने मूल तत्वों में वापस लौट जाना है। यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था सृजन और विसर्जन का संतुलन है; काल जब आकारों को बदलता है, तो वह केवल नए सृजन के लिए स्थान निर्मित कर रहा होता है।
इस भौतिक रूपांतरण के मध्य ब्रह्मांड में केवल एक ही तत्व ऐसा है जिसका कभी क्षय नहीं होता, और वह है 'सूचना' (Information) अथवा 'सत्व'। जैविक स्तर पर देखें तो किसी जीव का भौतिक शरीर भले ही नष्ट हो जाता है, किंतु उसके जीवन के अनुभव और जैविक डेटा उसकी आने वाली पीढ़ियों में डीएनए (DNA) के वंशानुगत सूत्रों के भीतर 'सत्व के कोश' के रूप में निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं। इसी प्रकार, समष्टिगत स्तर पर मनुष्य के नाम और भौतिक पहचान भले ही ओझल हो जाएं, किंतु उनकी चेतना का सत्व अमर रहता है। जब हम पृथ्वी के गर्भ से निकले प्राचीन भग्नावशेषों को देखते हैं, तो उनका भौतिक वैभव मौन हो चुका होता है, किंतु उनके भीतर समाहित मानवीय मेधा आज भी जीवंत दिखाई देती है। मिट्टी में दबे वे खंडहर इस बात के सुंदर प्रमाण हैं कि समय भले ही भौतिक आकारों को अपरिवर्तित रखने के लिए उत्तरदायी न हो, किंतु वह उस 'सत्व' को पूरी निष्ठा से सुरक्षित रखता है जो समष्टिगत चेतना के विकास में सहायक होता है। जब किसी ऐतिहासिक सभ्यता का उत्खनन होता है, तो काल केवल उसके मलबे को नहीं दिखाता, बल्कि उस युग के विज्ञान, जीवन-शैली, नगर-नियोजन और सामूहिक बुद्धिमत्ता को उजागर करता है।
काल के इसी वक्ष पर अनादि काल से निष्काम मनीषियों और तटस्थ द्रष्टाओं की एक पावन धारा निरंतर बहती आई है। जब कोई चेतना व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठकर केवल अस्तित्व के बेबाक सच को दर्ज करने के लिए तत्पर होती है, तो उसका स्वयं का अस्तित्व पूरी तरह गौण हो जाता है। इतिहास ऐसे ऋषियों और खोजी यात्रियों से भरा पड़ा है जिन्होंने हज़ारों मील की दुर्गम यात्राएँ कीं, अपने प्राणों को संकट में डाला, किंतु अपने वृत्तांतों में स्वयं को केवल एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया। उनके लेखन व्यक्तिगत गाथा बनने के बजाय उस युग के समाज, ज्ञान-परंपरा और मानवीय मूल्यों का प्रामाणिक दस्तावेज़ बन गए। यदि वे अपने व्यक्तिगत अनुभवों या मार्ग की कठिनाइयों को दर्ज भी करते हैं, तो वह केवल आने वाले यात्रियों को सचेत करने और एक करुणामय सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए होता है। वे इतिहास के मंच पर स्वयं को नायक के रूप में स्थापित नहीं करते, बल्कि उस प्रकाश के संवाहक बनते हैं जो समय की सिला पर हमेशा प्रासंगिक रहता है।
इसी बिंदु से काल की एक और गहरी परत स्पष्ट होती है। इतिहास जहाँ केवल बाह्य घटनाओं और भौतिक आकारों का एक सीमित लेखा-जोखा मात्र रह जाता है, वहीं पुराण उस युग के वास्तविक सत्व, आंतरिक चेतना और शाश्वत सत्य को दर्ज करता है। इतिहास संरचनाओं को गिनता है और तिथियों का क्रम रखता है, किंतु पुराण उस युग के अनुभवों से निकले हुए निचोड़ को ब्रह्मांडीय स्मृति (Cosmic Memory) में अमर बना देता है। वास्तव में, ये कालजयी सत्य ही समय के उस शाश्वत स्पंदन को पकड़ते हैं, जो युगों-युगों तक गूँजता रहता है।
हर युग और समय की अपनी दृष्टि और समझ होती है। इसी कारण अक्सर यह कहा जाता है कि समय के साथ मनुष्य के विचार बदलते रहते हैं। परंतु यदि हम इसे अधिक गहराई से और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो विचारों का यह रूपांतरण कोई आकस्मिक विस्थापन नहीं, बल्कि उनका क्रमिक 'परिष्करण' (Refine) है। जिसे केवल परिवर्तन मान लिया जाता है, वह वास्तव में चेतना के विकास का एक अनिवार्य सोपान है। यह प्रक्रिया विचारों के भटकने की नहीं, बल्कि उनके और अधिक केंद्रित होने की है। परिष्करण का अर्थ है—अनुभव और बोध की सघनता के साथ विचार का अपने मूल, शुद्ध और केंद्रीय सत्य की ओर अग्रसर होना। यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे कच्चे सोने को अग्नि में तपाया जाता है। अग्नि सोने के मूल सत्व को बदलती नहीं है, बल्कि उसके भीतर की अशुद्धियों को दूर कर देती है, जिससे उसका वास्तविक और शुद्धतम कुंदन स्वरूप निखर कर सामने आता है। जब मानव चेतना जीवन के अनुभवों की भट्टी में तपती है, तो उसके पूर्वाग्रह और अज्ञान की परतें स्वतः ही विलीन हो जाती हैं। विचार का यह परिष्करण ही मनुष्य को उसकी व्यक्तिगत संकीर्णताओं से मुक्त करके समष्टिगत चेतना (Universal Consciousness) से जोड़ता है। आधुनिक विज्ञान एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) के माध्यम से हमें सिखाता है कि हमारे जीनों की बुनियादी संरचना के परे भी एक पर्यावरणीय और संज्ञानात्मक परिवेश होता है, जो यह निर्धारित करता है कि कौन से जैविक निर्देश सक्रिय होंगे और कौन से सुप्त रहेंगे। अपने समय के सच को निष्काम भाव से दर्ज करने वाले मनीषी वास्तव में आने वाली पीढ़ियों के मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए एक आदर्श परिवेश तैयार कर रहे होते हैं। उनकी यह परोपकारी अभिव्यक्ति ही आने वाले मनुष्यों की चेतना को जाग्रत करने का जैविक और बौद्धिक ईंधन बनती है।
जब यह परिष्करण अपने 'चरम' को प्राप्त करता है, तो विज्ञान और अध्यात्म के बीच की आभासी दूरियाँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। विज्ञान जब तक केवल भौतिक पदार्थों और उनके आयामों को नापता है, तब तक वह केवल एक बाहरी गणना प्रतीत होता है। परंतु जैसे ही वह इस सत्य को स्वीकार करता है कि इस पूरी ब्रह्मांडीय व्यवस्था के पीछे एक अनंत सूचना तंत्र और अंतर्निहित चेतना कार्य कर रही है, विज्ञान स्वयं एक गहरी अनुभूति में बदल जाता है।
जब जगदीश चंद्र बोस ने अपनी प्रयोगशाला में अत्यंत संवेदनशील यंत्रों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि धातुएं और वनस्पतियां भी बाहरी उद्दीपनों पर ठीक उसी प्रकार प्रतिक्रिया देती हैं जैसे एक जीवित मनुष्य; तो उन्होंने वनस्पति विज्ञान के शुष्क आंकड़ों में एक जीवंत चेतना का संचार कर दिया। उन्होंने दिखाया कि जब एक पौधे को विष दिया जाता है, तो उसकी कोशिकीय छटपटाहट किसी भी संवेदनशील जीव की पीड़ा जैसी ही होती है। यह वैज्ञानिक खोज वास्तव में उस प्राचीन उपनिषदिक सत्य का ही आधुनिक परिष्करण थी जो चराचर जगत में एक ही चेतना के स्पंदन की बात करता है।
जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने भौतिक जगत में द्रव्यमान और ऊर्जा के अंतर्संबंध (E=mc²) को प्रतिपादित किया, तो वह केवल एक गणितीय सूत्र नहीं था। वह दृश्य जगत की नश्वरता और उसके पीछे छिपी ऊर्जा की अमरता का वैज्ञानिक प्रमाण था। आइंस्टीन ने जब इस असीम और सुव्यवस्थित ब्रह्मांडीय बुद्धिमत्ता (Cosmic Intelligence) को देखा, तो उनका मन एक गहरे विस्मय और श्रद्धा से भर गया। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि इस भव्य व्यवस्था के प्रति कौतुक का भाव ही उनकी आध्यात्मिकता का स्रोत था।
जब क्वांटम भौतिकी के प्रणेताओं—इरविन श्रोडिंगर और वर्नर हाइजेनबर्ग—ने आधुनिक विज्ञान की दूरबीन से परमाणु के भीतर झांका, तो उन्होंने पाया कि वहाँ कुछ भी ठोस या निश्चित नहीं है। सब कुछ संभावनाओं और तरंगों (Waves) का एक अनंत नृत्य है। श्रोडिंगर भारतीय वेदांत दर्शन से अत्यंत गहरे प्रभावित थे। उन्होंने अनुभव किया कि परमाणु के भीतर 'द्रष्टा' (Observer) और 'दृश्य' (Observed) को अलग नहीं किया जा सकता; वे दोनों एक ही समष्टिगत चेतना के दो छोर हैं।
समय का अंतिम न्याय यही है कि वह अहंकार-केंद्रित प्रयासों को धीरे-धीरे विलीन कर देता है और समष्टि-केंद्रित सृजन को अमर बना देता है। जो अभिव्यक्तियाँ और विचार अपने युग की सीमाओं को तोड़कर समष्टि के कल्याण के लिए बहते हैं, उन्हें काल अपने वक्ष पर सदा के लिए अंकित कर लेता है। जब मनुष्य अपने 'अहं' को विसर्जित कर सत्य के प्रवाह के साथ बहना शुरू करता है, तो उसके द्वारा किए गए कार्य ही उसकी वास्तविक आत्मकथा बन जाते हैं। ऐसी रचनाएँ समय के प्रवाह से परे स्वतः ही कालजयी हो जाती हैं; आने वाले युग अपनी आवश्यकता से उनके भीतर छिपे सत्व को खोजने और अपनाने के लिए बाध्य होते हैं। यह काल की वही निष्पक्ष और बेबाक लेखनी है जो सदियों से सत्य को सहेजती आ रही है।
डॉ. अशोक तिवारी