यह सूत्र साफ़ दिखाता है कि जो केवल सिद्धांतों को जानता है वह ज्ञानी है, लेकिन जो उस ज्ञान का व्यावहारिक, रचनात्मक और लोक-कल्याणकारी उपयोग करना जानता है, वह 'विज्ञानी' है; और ऐसा विज्ञानी ईश्वर को भी अत्यंत प्रिय होता है। यही विज्ञान की सच्ची ईश्वर-भक्ति है, जहाँ कर्म ही पूजा बन जाता है। वास्तव में, विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को अनवरत, परत-दर-परत खोजने की एक सतत प्रक्रिया है, और इसी निरंतर वैचारिक मंथन व अनुसंधान की प्रक्रिया से ही तकनीक का जन्म होता है, जो अंततः लोक-कल्याण के मार्ग को प्रशस्त करती है। जब हमने भाप के भीतर छिपे फैलाव और दबाव के विज्ञान को समझा और उसे लोहे के पहियों, पिस्टन और सिलेंडरों के भौतिक सांचे में ढाला, तब भाप के इंजन का जन्म हुआ। यह एक ऐसा आविष्कार था जिसने भौगोलिक दूरियों को समेट कर मानवीय संबंधों को पास ला दिया। इसी तरह, जब सूर्य की किरणों से बिजली बनाने के सूक्ष्म वैज्ञानिक सिद्धांतों को सिलिकॉन की परतों और तारों के जाल में बुना गया, तो सोलर पैनल अस्तित्व में आए। आज वही तकनीक एक साधारण किसान के खेत में पानी का फव्वारा बनकर लहलहा रही है। हवा में तैरती अदृश्य तरंगों के माध्यम से ध्वनि को एक कोने से दूसरे कोने तक भेजने का विज्ञान जब एक छोटी सी चिप और कांच की स्क्रीन में सिमटा, तो वह मोबाइल फोन बन गया, जिसने आज पूरी दुनिया को हर हाथ की मुट्ठी में ला खड़ा किया है। तकनीक, विज्ञान के ऊंचे सिद्धांतों को आम आदमी के इस्तेमाल के योग्य बनाती है।