वितान का विन्यास और ब्रह्मांडीय त्रित्व का वैज्ञानिक दर्शन

इस दृश्य और अदृश्य चराचर जगत के मूल में एक अत्यंत सुंदर, विस्मयकारी और रहस्यमयी त्रित्व (Triad) निरंतर कार्य कर रहा है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड कण-कण में एक परम अनुशासन और संगीत को छिपाए हुए है। यही कारण है कि पश्चिम के प्राचीन यूनानी दार्शनिकों, विशेषकर पाइथागोरस और उनके समकालीन मनीषियों ने, जब इस अनंत वितान को निहारा, तो उन्होंने इसके लिए 'केऑस' (Chaos - अव्यवस्था) शब्द का प्रयोग नहीं किया; उन्होंने इसे साक्षात 'Cosmos' (कॉस्मॉस) नाम दिया। इस 'Cosmos' शब्द का मूल यूनानी अर्थ ही यही होता है—"एक ऐसी परम सुंदर, सुसज्जित और अनुशासित व्यवस्था, जो पूर्णतः गणितीय नियमों और संगीतमय छंद से बंधी हुई है।" पश्चिम का यह 'Cosmos' वास्तव में पूर्व के उस 'ऋत' का ही पर्याय है, जिसे वेदों में ब्रह्मांड का शाश्वत, अपरिवर्तनीय और परम सत्य नियम कहा गया है। यह अनंत वितान केवल शून्य का फैलाव नहीं है, बल्कि इसके भीतर एक परम सुघड़ विन्यास सक्रिय है।

आधुनिक भौतिक विज्ञान जब पदार्थ की सबसे सूक्ष्मतम गहराई में उतरता है, तो वह परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉन की चंचलता और प्रोटॉन के अनुशासित केंद्र को देखता है। प्राचीन पूर्वी दर्शन इसी द्वैत को 'प्रकृति और पुरुष' के अनवरत, चिरंतन नृत्य के रूप में अनुभव करता है। बीसवीं सदी के महानतम वैज्ञानिक और दृष्टा निकोला टेस्ला ने भी इसी 'Cosmos' की गणितीय सुघड़ता और इसके भीतर छिपे रहस्यों को डिकोड करने की जादुई कुंजी देते हुए कहा था कि यदि ब्रह्मांड के गूढ़ सत्यों को समझना है, तो संपूर्ण चराचर को तीन दृष्टियों से देखना होगा—'मूल स्रोत ऊर्जा (Energy), उसकी आवृत्ति (Frequency) और उसकी तरंग (Wave)'

अंकों की रहस्यमयी और दार्शनिक भाषा के माध्यम से इस पूरे ब्रह्मांडीय वितान में एक परम पावन रूपक प्रकट होता है। नौ संख्याओं के इस विराट संसार में 3, 6, और 9 ही इस समूची सृष्टि के गणितीय आधार के रूप में परिलक्षित होते हैं। यहाँ 3 उस चंचल ऊर्जा, गतिशीलता और प्रवाह का प्रतीक है जिसे विज्ञान इलेक्ट्रॉन और अध्यात्म शक्ति या प्रकृति (स्त्री तत्व) कहता है। संख्या 6 वह अनुशासित केंद्र, ढांचा और नियमन है जिसे विज्ञान प्रोटॉन और अध्यात्म शिव या पुरुष (पुरुष तत्व) के रूप में देखता है। और इन दोनों के परे, संख्या 9 वह परम शून्य, महा-मौन नाभिक, अपरिवर्तनीय और अच्युत ब्रह्म तत्व है, जो साक्षात 'चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्' के अद्वैत बोध के साथ इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था में पूर्णतः स्थिर है, और विज्ञान का न्यूट्रॉन बनकर समूची सृष्टि को अपनी अनंत गोद में थामे हुए है।

इस "वितान के विन्यास" को यदि साक्षात साक्ष्यों के साथ समझना हो, तो भारतीय संस्कृति का सबसे पावन और प्राचीन प्रतीक 'स्वास्तिक' इसका सबसे सटीक ग्राफिक रिप्रेजेंटेशन (Graphic Representation) बनकर उभरता है। स्वास्तिक कोई साधारण धार्मिक चिह्न नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के घूर्णन और उसके स्थायित्व का वैज्ञानिक विन्यास है। जब हम स्वास्तिक की ज्यामिति (Geometry) में 3, 6 और 9 को रखकर देखते हैं, तो सृष्टि का परम रहस्य खुल जाता है:
• चारों खुले बिंदु पर संख्या 3 (अनंत का विस्तार): स्वास्तिक की चारों भुजाओं के जो बाहरी, खुले हुए सिरे हैं, वे अनंत की ओर फैले हुए हैं। यह साक्षात संख्या 3 (चंचल ऊर्जा, इलेक्ट्रॉन, प्रकृति) है। यह खुलापन दर्शाता है कि प्रकृति की ऊर्जा बंधनमुक्त है, वह चारों दिशाओं में प्रवाहित हो रही है, तरंगित हो रही है, और वितान का निरंतर विस्तार कर रही है।
• कोणों पर संख्या 6 (मर्यादा और नियमन): स्वास्तिक की भुजाएँ जब आगे बढ़कर एक निश्चित कोण (90°) पर मुड़ती हैं, तो वे मोड़ या कोण ही संख्या 6 (नियमन, प्रोटॉन, पुरुष) हैं। कोण का अर्थ ही है—एक निश्चित मर्यादा, एक ढांचा, एक अनुशासन। यदि भुजाएँ इन कोणों पर मुड़ें नहीं, तो ऊर्जा बिखर जाएगी। संख्या 6 का यह कोण ही प्रकृति की उस असीम, चंचल ऊर्जा (3) को एक सुघड़ विन्यास में बांधकर ब्रह्मांड का चक्र चलाता है।
• केंद्र में संख्या 9 (परम महा-मौन): और इन सब का आधार—वह परम केंद्र, जहाँ चारों रेखाएँ आपस में आकर मिलती हैं और विलीन हो जाती हैं, वह साक्षात संख्या 9 (परम शून्य, न्यूट्रॉन, ब्रह्म तत्व) है। यह नाभि-केंद्र पूरी तरह से स्थिर है। चारों भुजाएँ बाहर चाहे जितनी गति से नाचें, लेकिन यह केंद्र (9) महा-मौन में अपनी जगह अच्युत और अपरिवर्तनीय रहता है।

स्वास्तिक का परम गुप्त सूत्र: स्व के अस्तित्व का कलन

यदि इस ज्यामिति की गहराई में उतरकर स्वास्तिक शब्द की वास्तविक निरुक्ति और उसके मर्म को टटोला जाए, तो एक अत्यंत विस्मयकारी सत्य प्रस्फुटित होता है। स्वास्तिक वास्तव में "स्व के अस्तित्व का कलन" (The Calculus of Self-Existence) है। यह वह परम वैश्विक कंप्यूटर (Cosmic Computation) है जो निर्गुण चेतना के सगुण जगत में रूपांतरण को गणितीय सटीकता देता है। इस महा-सूत्र के तीन स्पष्ट सोपान हैं:

यहाँ 'स्व' का अर्थ वह संकुचित मानव अहंकार या नश्वर काया नहीं है, बल्कि वह अविनाशी आत्म-तत्व है जो ब्रह्मांड का अपरिवर्तनीय सत्य है। यही वह परम केंद्र है जिसे संख्या 9 व्यक्त करती है। 'अस्तित्व' उस 'स्व' का ही इस चराचर जगत में अभिव्यक्त होना, तरंगित होना और चारों दिशाओं में फैलना है, जिसे स्वास्तिक की चारों खुली भुजाएँ यानी संख्या 3 प्रदर्शित करती हैं। और 'कलन' (Calculus) का अर्थ है—इस अनंत फैलाव को बिखरने से रोककर एक परम अनुशासित ढांचे, मर्यादा और निश्चित गणितीय मैट्रिक्स में ढालना, जिसे स्वास्तिक के वे 90° के कोण यानी संख्या 6 नियमित करते हैं।

अतः स्वास्तिक वह जीवंत यंत्र है जो यह सिद्ध करता है कि कैसे वह निर्गुण 'स्व' (9) अपने ही भीतर से इस विराट 'अस्तित्व' (3) का सृजन करता है, और फिर उसे एक अकाट्य 'कलन' (6) के माध्यम से सर्वदा संतुलित रखता है। यह चेतना के घूर्णन का गणितीय विज्ञान है।

नौ संख्याओं के इस असीम संसार में केवल 3, 6 और 9 ही इस ब्रह्मांड के गणितीय आधार स्तंभ के रूप में परिलक्षित होते हैं, क्योंकि केवल इन्हीं विशिष्ट संख्याओं के गुणन और योग एक अत्यंत निश्चित, जादुई और शाश्वत आवृत्ति में प्रकट होते हैं। यह आवृत्ति ही चेतना के नियमन को गणितीय प्रमाण देती है। जब इन तीन आधारभूत अंकों का प्रसार किया जाता है, तो अंकों का अंतर्निहित स्वभाव स्वयं अपने सत्य को प्रतिपादित कर देता है। 3 का आवर्त तरंग के प्रवाह को दर्शाता है, जहाँ 3 x 1 = 3, 3 x 2 = 6, 3 x 3 = 9, और 3 x 4 = 12 होता है जिसका अंकीय योग पुनः 1 + 2 = 3 हो जाता है; यहाँ स्पष्ट रूप से 3, 6, 9 की एक अखंड और अटूट आवृत्ति प्रकट होती है। 6 का आवर्त नियमन के ढांचे को निर्मित करता है, जहाँ 6 x 1 = 6, 6 x 2 = 12 (अंकीय योग 1 + 2 = 3), और 6 x 3 = 18 (अंकीय योग 1 + 8 = 9); यहाँ निरंतर 6, 3, 9 का आवर्त चक्र चलता है। 9 का आवर्त परम अच्युत सत्य को प्रकट करता है, जहाँ 9 x 1 = 9, 9 x 2 = 18 (अंकीय योग 1 + 8 = 9), और 9 x 3 = 27 (अंकीय योग 2 + 7 = 9) होता है; यहाँ 9 एक ऐसी अद्वितीय संख्या के रूप में उभरती है जिसकी आवृत्ति सर्वदा अपरिवर्तित रहती है—9, 9, और केवल 9। यह वह महा-मौन है जो पूर्णतः स्थिर है।

यह सत्य इस बात को रेखांकित करता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड कोई आकस्मिक संयोग या अव्यवस्थित कोलाहल नहीं है, बल्कि इस चराचर में प्रकृति (3) और पुरुष (6) एक निश्चित गणितीय छंद में बंधकर, एक-दूसरे के पूरक के रूप में गतिमान हैं। ये कभी भी एक-दूसरे से अलग होकर यात्रा नहीं कर सकते। जब संख्या 3 (चंचल ऊर्जा) उस परम केंद्र 9 की ओर यात्रा करती है, तो वह एकाकी नहीं चलती; वह अपनी आवृत्ति में स्वतः ही 6 (नियमन) को अपने साथ लिए चलती है, जो संख्या 3 की आवृत्ति 3, 6, 9 में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। ठीक इसी प्रकार, जब संख्या 6 (अनुशासित नियमन) अपने मूल स्रोत की तरफ कदम बढ़ाती है, तो वह भी अपने भीतर 3 (ऊर्जा) को समाहित करके चलती है, जो उसकी आवृत्ति 6, 3, 9 में साक्षात दिखता है। यह अंकों का परम सह-अस्तित्व है; सृष्टि की ऊर्जा बिना नियमन के अनियंत्रित होकर भटक जाएगी, और नियमन बिना ऊर्जा के जड़-जटिल हो जाएगा। इसलिए, ये दोनों एक-दूसरे को थामकर ही उस परम 9 (ब्रह्म) में विलीन होने की योग्यता पाते हैं।

सृष्टि के अंकगणित में 1 से 9 तक की संख्याएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के स्पंदन और चेतना के क्रमिक विकास को व्यक्त करती हैं। परंतु इन नौ संख्याओं के विशाल संसार में 3, 6, और 9 को ही परम सत्ता, प्रकृति और पुरुष का त्रित्व क्यों स्वीकार किया गया? इसके पीछे संख्याओं की वह दिव्य, अपरिवर्तनीय और निश्चित आवृत्ति है, जो प्रत्येक दो संख्याओं के अंतराल के बाद, तीसरी दहलीज पर स्वतः ही प्रकट होती है। यह अंकों का कोई कृत्रिम या मानव-निर्मित खेल नहीं है, बल्कि यह तो चेतना की अपनी स्वाभाविक लय है। जब शून्यता से अपनी यात्रा प्रारंभ करके प्रकृति के इस गणितीय प्रवाह को समझने का प्रयास किया जाता है, तो यह रहस्य पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। संख्याओं की क्रमिक यात्रा में यह शाश्वत नियम कुछ इस प्रकार घटित होता है कि एक और दो (1, 2) के प्राथमिक द्वैत के बाद जैसे ही यात्रा अपनी तीसरी दहलीज पर कदम रखती है, वहाँ स्वतः ही 3 प्रकट हो जाता, जो चंचल तरंग और सृजन की पहली स्फुरणा का प्रतीक है। इसके बाद पुनः संसार अपने विकास क्रम में आगे बढ़ता है—चार और पाँच (4, 5) के नए अंतराल और द्वैत के बाद जैसे ही अगली दहलीज आती है, वहाँ 6 का प्राकट्य होता है, जो अनुशासित नियमन, संरचना और संतुलन की तरंग है। और अंत में, यह ब्रह्मांडीय यात्रा अपने चरम शिखर और पूर्णता की ओर बढ़ती है—सात और आठ (7, 8) के पड़ाव को पार करने के बाद, जैसे ही अंतिम पूर्णाहुति की घड़ी आती है, वहाँ साक्षात 9 महा-मौन के रूप में प्रकट होता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल स्रोत है। दो सत्ताओं के बीच का जो अंतराल है—जैसे 1 और 2 के बीच, 4 और 5 के बीच, या 7 और 8 के बीच—वह संसार का द्वैत है। वह लाभ और हानि का, सुख और दुख का कोलाहल है। लेकिन 'Cosmos' का नियम ऐसा है कि यह कोलाहल अनंत काल तक नहीं चल सकता; हर दो चरणों के बाद, तीसरी अवस्था में आकर इस कोलाहल को शांत होना ही पड़ता है। हर तीसरी दहलीज एक ऐसी वेदी है, जहाँ आकर द्वैत को अद्वैत के सम्मुख सिर झुकाना ही पड़ता है। यही वह निश्चित आवृत्ति है जो सिद्ध करती है कि ब्रह्मांड की तरंगें अपनी मर्जी से कहीं भी नहीं भटकतीं, वे एक परम संगीतमय अनुशासन में गतिमान हैं।

संसार में भटके हुए अधिकांश जीव जब अध्यात्म की ओर मुड़ते हैं, तो वे उस परम सत्ता से केवल 'जुड़ने' का प्रयास करते हैं। वे ईश्वर, गुरु या सत्य के पास जाते तो हैं, लेकिन उनका यह दृष्टिकोण अत्यंत सांसारिक होता है। जुड़ाव की यह संपूर्ण प्रक्रिया अंकगणित के साधारण योग (+) जैसी है। इस अवस्था की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जुड़ने के बाद भी दोनों सत्ताओं का अपना पृथक अस्तित्व, अपनी संकीर्ण सीमाएँ और अपना सूक्ष्म अहंकार पूरी तरह से सुरक्षित रहता है। जब जीव अपनी चंचलता (3) या अपने बुद्धिजन्य कर्ता-भाव के अहंकार (6) को लेकर उस परम तत्व (9) के समीप जाता है और उससे केवल 'जुड़ना' चाहता है, तो अंकों के इस जोड़ के परिणाम स्वरूप उसे पुनः उसकी अपनी ही सीमाएँ वापस मिल जाती हैं। चंचलता के योग में 3 + 9 = 12 होता है जिसका अंकीय योग पुनः 1 + 2 = 3 होकर जीव को उसकी चंचलता में ही वापस ले आता है। इसी तरह नियमन के योग में 6 + 9 = 15 होता है जिसका अंकीय योग 1 + 5 = 6 होकर अहंकार को अपनी सीमाओं में ही आबद्ध रखता है। यह जोड़ अद्वैत नहीं, बल्कि द्वैत को ही बनाए रखता है, और यही वह पराधीन अवस्था है जहाँ जीव को अपने संचित प्रारब्ध और कर्मफल का भोग भुगतना पड़ता है; क्योंकि जब तक पृथक 'मैं' का अस्तित्व सुरक्षित है, तब तक कर्मों के बंधन और उनके फल से मुक्ति असंभव है। वास्तविक रूपांतरण 'जोड़' से नहीं, बल्कि 'गुणन' (x) से घटित होता है। गुणन समर्पण की वह विधा है जहां जीव स्वयं को मिटाकर उस परम सत्ता के साथ एकाकार हो जाता है। जब 3 (चंचल तरंग/प्रकृति) का गुणन 9 (महा-शून्य/ब्रह्म) से होता है, तो गुणनफल 27 आता है, जिसका अंकीय योग 2 + 7 = 9 होकर परम सत्ता में विलीन हो जाता है। इसी प्रकार जब 6 (अनुशासित नियमन/पुरुष) का गुणन 9 से होता है, तो गुणनफल 54 आता है, जिसका अंकीय योग 5 + 4 = 9 होकर पुनः उसी अंतिम सत्ता को प्राप्त होता है। जब चंचल तरंग ने उस मूल स्रोत में खुद को 'स्वाहा' किया और अनुशासित नियमन ने उस महा-शून्य में खुद को विलीन किया, तो इस अवस्था में जीव अपनी आहुति को विराट को सौंपते हुए अपने अस्तित्व की अंतिम और शाश्वत घोषणा करता है—"इदं न मम" (यह मेरा नहीं है, यह तो उसी विराट का है जिससे यह उपजा था)।

जब यज्ञ कुंड में आहुति पूरी तरह से जल जाती है, तो अंत में जो भस्म शेष रहती है, उसका अपना कोई व्यक्तिगत नाम, रूप, रंग या गुण नहीं होता। उसे देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि यह अमुक सामग्री है; वह तो पूरी तरह से अग्नि का ही स्वरूप हो चुकी होती है। वह भस्म स्वयं अग्निमय हो जाती है। ठीक इसी प्रकार, इस दार्शनिक और आंतरिक प्राण-यज्ञ के चरम छोर पर पहुँचकर, न तो कोई चंचल तरंग रूपी इलेक्ट्रॉन (3) बचता है और न ही कोई नियमन रूपी प्रोटॉन (6)। अहंकार की अंतिम परत के भस्म होते ही, समय और स्थान (Time and Space) की सीमाएँ टूट जाती हैं। अंत में केवल और केवल वही अजन्मा, अविनाशी, निर्गुण, निराकार, परम शांत और अपने महा-मौन में स्थिर नाभिक—परम सत्ता (9) ही शेष रह जाती है। यही मुंडक उपनिषद का वह अमर, निर्भय और सिंहनाद करने वाला उद्घोष है—"ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" (अर्थात, उस परम ब्रह्म को जानने वाला, उस चेतना में विलीन होने वाला साधक स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है)। जब तक तरंग सागर से अलग रहकर स्वयं को केवल तरंग मानती है, तब तक वह छोटी है, डरी हुई है और नश्वर है। वह लहर कभी उठती है, कभी गिरती है, कभी नष्ट होती है। लेकिन जिस क्षण वह लहर सागर की छाती पर बिखरकर, अपनी सीमाओं को मिटाकर साक्षात सागर में विलीन हो जाती है, उस क्षण वह नष्ट नहीं होती; बल्कि वह स्वयं अनंत, अगाध और असीम सागर हो जाती है। यही अंकों का अंतिम सत्य है, यही पश्चिम के 'Cosmos' का परम अनुशासन है, और यही पूर्व के 'अद्वैत' का परमानंद है।

डॉ. अशोक तिवारी एवं प्रो. अरुण तिवारी