​मौन और ध्यान
मानव चेतना की अनंत यात्रा में विज्ञान और दर्शन कभी भी दो भिन्न दिशाएं नहीं रहे हैं, बल्कि वे एक ही सत्य को खोजने वाले दो दृष्टिकोण हैं, जिनमें से एक बाहर की ओर देखता है और दूसरा भीतर की ओर। आधुनिक न्यूरोबायोलॉजिकल शोध जब मस्तिष्क की जटिल संरचना और उसकी असीम क्षमताओं का अध्ययन करते हैं, तो वे अनजाने में ही सनातन वाक् सिद्धांत की उन गहराइयों को छू लेते हैं जिन्हें हमारे मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व अपने अंतर्मन में देखा था। मानव मस्तिष्क की विकासवादी यात्रा को यदि हम गहराई से देखें, तो यह चेतना के स्थूलीकरण की वही प्रक्रिया है जिसे भारतीय दर्शन में परावस्था से वैखरी तक की यात्रा कहा गया है। परा वाक् की वह परम अवस्था है जहाँ कोई विकार नहीं है, जो पूरी तरह से दोषमुक्त यानी वास्तविक अर्थों में एक निर्मल 'डी-फॉल्ट' मोड है, जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड और प्रकृति के साथ हमारी चेतना का एक अबाध और शांत जुड़ाव होता है। भौतिकी और जीवविज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई भी प्रणाली अपनी इस मूल और शांत अवस्था में होती है, तो उसका ऊर्जा व्यय न्यूनतम होता है, और यही वह अवस्था है जहाँ मस्तिष्क परम विश्राम और ऊर्जा के संचय का अनुभव करता है। परंतु जैसे-जैसे हम बाह्य जगत के प्रभावों, दृश्यों और घटनाओं के संपर्क में आते हैं, हमारे भीतर एक उत्सुकता का जन्म होता है, जो पश्यंति की अवस्था है जहाँ विचार अभी अमूर्त रूप में केवल एक स्पंदन बनकर उभरता है। यहाँ से हमारी चेतना मध्यमा में प्रविष्ट होती है, जहाँ मस्तिष्क बाह्य संकेतों, भाषा और तर्कों के माध्यम से उस आंतरिक स्पंदन को समझने और भौतिक जगत में उसके प्रकटीकरण का स्वरूप तय करने के लिए एक मानसिक मंथन शुरू करता है। मध्यमा के इस स्तर पर मस्तिष्क के फ्रंटल और टेम्पोरल लोब्स अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं और विचारों का एक द्वंद्व शुरू होता है, जिसके समानांतर हम अपने आसपास की भाषा और प्रतीकों की समझ विकसित करते रहते हैं। अंततः जब यह सारा ज्ञान समेकित हो जाता है, तो हम वैखरी के माध्यम से, यानी अपनी वाणी, अक्षरों और शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा इस भौतिक जगत के साथ संपर्क स्थापित करने लायक बनते हैं।
परा से वैखरी तक की इस पूरी विकासवादी और दैनिक प्रक्रिया के दौरान जैसे-जैसे मस्तिष्क बाह्य क्रियाओं में उलझता जाता है, वैसे-वैसे हर स्तर पर ऊर्जा का खर्च तेजी से बढ़ता जाता है। न्यूरोसाइंस की भाषा में कहें तो मोटर कॉर्टेक्स और विजुअल एसोसिएशन एरिया को सक्रिय रखने के लिए एटीपी के रूप में भारी ऊर्जा की खपत होती है, जिससे मानसिक शोर बढ़ता है और मस्तिष्क में एक प्रकार की अशांति या एंट्रॉपी उत्पन्न होने लगती है। जब हमारी बुद्धि चौबीसों घंटे केवल इसी वैखरी के कोलाहल और मध्यमा के वैचारिक द्वंद्व में उलझी रहती है, तो वह अपनी मूल निर्मलता खो देती है और एक ऐसे विकार युक्त 'फॉल्ट मोड' में रहने लगती है जिसे आधुनिक समाज तनाव, अवसाद और मानसिक थकावट के रूप में जानता है। यही वह परम सत्य था जिसे हमारे मनीषियों ने बहुत गहराई से समझ लिया था, और इसीलिए उन्होंने मानव जीवन में ध्यान और मौन को सर्वोपरि वरीयता दी थी। मौन और ध्यान कोई निष्क्रिय अवस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे चेतना को उसके मूल स्वरूप में वापस लाने की एक अत्यंत परिष्कृत और वैज्ञानिक 'रिवर्स इंजीनियरिंग' हैं। जब हम सजगता के साथ मौन धारण करते हैं, तो वैखरी का वह बाहरी कोलाहल थमता है जो हमारी जीवन-ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट कर रहा था, और जैसे ही वाणी शांत होती है, संचित ऊर्जा भीतर की ओर मुड़ने लगती है। इसके पश्चात ध्यान के माध्यम से हम मध्यमा के उस वैचारिक शोर और निरंतर चलने वाले तार्किक द्वंद्व को थामते हैं, जिससे मस्तिष्क के न्यूरल सर्किट्स को वह गहरा आराम मिलता है जो सामान्य नींद में भी संभव नहीं है।
इस पूरी प्रक्रिया को यदि हम आणविक जीवविज्ञान के धरातल पर देखें, तो हमारे क्रोमोसोम्स के छोरों पर स्थित टेलोमीयर्स सीधे तौर पर हमारी जीवनशैली और इस मानसिक शोर से प्रभावित होते हैं। टेलोमीयर्स को हम बहुत ही सरल और सटीक रूप में क्रोमोसोम्स की उस 'मुठिया' की तरह समझ सकते हैं जो हमारी अनुवांशिक संरचना को आपस में कसकर बांधे रखती है, जैसे घर में साफ-सफाई के लिए उपयोग की जाने वाली झाड़ू की मुठिया यदि कसकर न रखी जाए तो उसकी तीलियां बिखर जाती हैं। अति-उत्तेजित जीवनचर्या, आत्म-सजगता का अभाव, प्राकृतिक नियमों के प्रति अनभिज्ञता और क्रोनिक मानसिक तनाव के कारण शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जो सीधे इस टेलोमीयर रूपी मुठिया पर प्रहार करता है और उसे शिथिल कर देता है, जिससे हमारी कोशिकाएं अपनी कार्यात्मक क्षमता खोने लगती हैं और जैविक आयु तेजी से बढ़ने लगती है। इसके विपरीत, जब हम ध्यान और मौन के माध्यम से अपनी चेतना को वापस समेटते हैं, तो शरीर का पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम और हमारी वैगस नर्व सक्रिय हो उठती हैं, जो हृदय गति को संतुलित करती हैं, तनाव के रसायनों को कम करती हैं और कोशिकीय स्तर पर मरम्मत का काम तेज कर देती हैं, जिससे वह जेनेटिक मुठिया कसी रहती है और हमारी जीवन-ऊर्जा बिखरने से बच जाती है।
प्रकृति स्वयं भी उम्र के एक निश्चित पड़ाव पर हमें इस आंतरिक यात्रा के लिए तैयार करती है, जहाँ न्यूरोहॉर्मोन के कुछ रिसेप्टर्स और ट्रांसपोर्टर्स प्राकृतिक रूप से धीमे और शिथिल होने लगते हैं। युवावस्था में बाह्य जगत की उत्तेजनाओं को तीव्रता से पकड़ने वाले ये रिसेप्टर्स जब उम्र के साथ कमजोर पड़ते हैं, तो संसार का वह तीव्र खिंचाव स्वतः ही कम होने लगता है और बुद्धि वैखरी तथा मध्यमा के कोलाहल से विमुख होकर अपनी मूल परावस्था की ओर लौटने के लिए मचल उठती है। यह शरीर क्रियाविज्ञान के स्तर पर उस मुक्ति या लिबरेशन का एक अत्यंत सुंदर और प्राकृतिक अनुभव है, जहाँ प्रकृति मनुष्य को पुनः शांत, निर्मल और विकार-रहित होने का अवसर प्रदान करती है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि हम वैखरी का त्याग कर दें या संसार से विमुख हो जाएं, क्योंकि वैखरी और मध्यमा हमारे वे अमूल्य उपकरण हैं जिनके माध्यम से हमें इस भौतिक जगत में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना है और विज्ञान तथा दर्शन का सृजन करना है। भूल केवल तब होती है जब हम इन बाह्य उपकरणों को ही अपनी अंतिम वास्तविकता मान बैठते हैं और उस आंतरिक केंद्र को भूल जाते हैं जहाँ से इन सब का उद्गम हुआ है।
सच्ची समझ और प्रज्ञा का प्रकटीकरण यही है कि हम दिनभर वैखरी के माध्यम से जगत के साथ संवाद स्थापित करें, मध्यमा के माध्यम से श्रेष्ठ विचारों का मंथन करें, परंतु समय-समय पर सजगता से मौन और ध्यान की शरण लेकर अपनी उस परम, निर्मल परावस्था में लौट आएं। जब हम इस प्रकार जीना सीख जाते हैं, तो मस्तिष्क का वह कृत्रिम फॉल्ट मोड स्वतः ही ठीक होने लगता है, मानसिक शोर शांत हो जाता, टेलोमीयर्स की तीलियां सुरक्षित रहती हैं और हम संपूर्ण ब्रह्मांडीय सूचना नेटवर्क के साथ एक शाश्वत सामंजस्य में स्थापित हो जाते हैं, जहाँ ज्ञान केवल सूचना नहीं रह जाता बल्कि एक जीवंत और आनंदमय आत्म-बोध बन जाता है।
डॉ. अशोक तिवारी