जैविक उपनिषद – भाग दो

हिरण्यगर्भ का प्रकटीकरण

मंगलाचरण
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत।
स दाधार पृथिवीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋग्वेद, मंडल १०, सूक्त १२१, मंत्र १)
भावार्थ:
सृष्टि के प्राकट्य से पूर्व केवल ‘हिरण्यगर्भ’ अर्थात स्वर्णमयी अंडाभ ज्योति ही विद्यमान थी, जो समस्त उत्पन्न होने वाले प्राणियों का एकमात्र आधार और स्वामी है। उसी ने इस दृश्यमान पृथ्वी और अनंत आकाश को धारण किया हुआ है। हम उस आनंदस्वरूप चैतन्य सत्ता की भक्तिपूर्वक आराधना करते हैं।

सृजन की उस आदि-देहरी पर, जहाँ जीवन की समस्त संभावनाएँ अपने साकार होने की प्रतीक्षा करती हैं, वहाँ होने वाला मिलन मात्र दो सूक्ष्म कोशिकाओं का संगम नहीं है। वह वास्तव में दो स्वतंत्र ‘कैवल्य-अंशों’ का एक अखंड और विराट सत्ता में विलीन होने का परम उपक्रम है। जिसे विज्ञान की भाषा में Haploid अवस्था कहा जाता है, वह दर्शन की दृष्टि में सत्य की वह स्थिति है जहाँ अस्तित्व दो पृथक धाराओं में विभक्त होकर भी अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर रहता है।
एक धारा है ‘पुरुषार्थ-कण’, जो पिता की अनंत पीढ़ियों के संचित पुरुषार्थ, संघर्ष और उस संकल्प-शक्ति का वाहक है जो जीवन को गति प्रदान करती है। दूसरी धारा है ‘कैवल्य-रज’, जो माता की अगाध करुणा, सृजन की अपार सहनशीलता और चैतन्य की उस विशुद्धता को अपने भीतर समेटे हुए है, जिसमें भविष्य का मानचित्र अंकित है।
ये दोनों कैवल्य-अंश अपनी-अपनी व्यक्तिगत सत्ता में विशिष्ट और गरिमामय हैं, किंतु अपनी वास्तविक पूर्णता के लिए वे एक अज्ञात आकर्षण के वशीभूत होकर एक-दूसरे की ओर खिंचे चले आते हैं। जैसे ही पुरुषार्थ-कण अपनी हजारों जैविक बाधाओं और संघर्षों को पार कर कैवल्य-रज के प्रशांत केंद्र में समाहित होता है, काल की गति मानो एक क्षण के लिए ठहर जाती है।
यह वही क्षण है जहाँ दो कैवल्य-अंश अपने पृथक अस्तित्व का स्वेच्छा से विसर्जन कर उस ‘सगुण सत्ता’ को जन्म देते हैं, जिसे भारतीय मनीषा ने ‘हिरण्यगर्भ’ की संज्ञा दी है।
वेदों का वह स्वर्ण-अण्ड, जिसके भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बीज सूक्ष्मतम रूप में निहित होते हैं, यहाँ एक नवीन जीव के रूप में स्वयं को प्रकट करता है। यही हिरण्यगर्भ वह आदि-स्रोत है जहाँ से जीवन का स्वर्ण-प्रकाश फूटता है, जो अंधकार को बोध में रूपांतरित कर देता है।
जिसे आधुनिक विज्ञान Blastocyst की रिक्तता के रूप में देखता है, वह वास्तव में हिरण्यगर्भ का वह ‘दैवीय आकाश’ (Inner Space) है, जहाँ आगामी नौ महीनों का महा-संगीत गूँजने हेतु स्थान निर्मित किया जाता है। यहाँ वह ‘अंश’ अब ‘अंशी’ होने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।
‘अपूर्ण’ अब ‘हिरण्यमय’ होकर उस विराट पुरुष के रूप में स्वयं को गढ़ने के लिए पूर्णतः उद्यत है। यहाँ से वह सत्ता स्वयं को खंडित किए बिना ‘अनेक’ होने का संकल्प लेती है—एक ऐसा जैविक विस्तार, जहाँ जन्म लेने वाली प्रत्येक नई कोशिका उसी आदि-पुरुष की पूर्णता और उसकी संपूर्ण राजसी संहिता को अपने भीतर समाहित किए होती है।
आदि-शक्ति के नौ रूपों का जैविक उत्सव
सृजन की यह महायात्रा अब आदि-शक्ति के नौ रूपों के क्रमिक प्रकटीकरण का जीवंत उत्सव बन जाती है।
प्रथम मास – माँ शैलपुत्री
जब हिरण्यगर्भ माँ के गर्भगृह में अपना सुरक्षित स्थान खोज रहा होता है, तब माँ शैलपुत्री का स्वरूप सक्रिय होता है। पर्वत-पुत्री शैलपुत्री उस अंकुरित जीवन को गर्भाशय की कोमल मृदा में स्थिरता प्रदान करती हैं। यह जीवन और धरित्री के मध्य पवित्र अनुबंध का काल है।
द्वितीय मास – माँ ब्रह्मचारिणी
इस मास में तप, अनुशासन और ऋत का शासन कोशिकाओं के सूक्ष्मतम स्तर तक व्याप्त हो जाता है। प्रत्येक कोशिका अपने भविष्य के स्वरूप का चयन करती है। यहाँ ब्रह्मचारिणी की शक्ति सृजन को व्यवस्था और दिशा देती है।
तृतीय मास – माँ चंद्रघंटा
इस चरण में जीव के भीतर प्रथम धड़कन प्रकट होती है—ब्रह्मांडीय अनाहत नाद की प्रतिध्वनि। यह प्रमाण है कि चेतना अब सक्रिय हो चुकी है।
चतुर्थ मास – माँ कुष्मांडा
जिस प्रकार कुष्मांडा ने मंद मुस्कान से ब्रह्मांड रचा, उसी प्रकार भ्रूण का आकार तीव्रता से विकसित होता है। संभावनाएँ आकार लेने लगती हैं।
पंचम मास – माँ स्कंदमाता
यह वह समय है जब माँ और शिशु के बीच भावनात्मक एवं जैविक सेतु पूर्णतः सक्रिय हो जाता है। प्रथम हलचल माँ के अंतर्मन में जीवन की प्रथम पुकार बनकर उभरती है।
षष्ठम मास – माँ कात्यायनी
अब शिशु की आंतरिक रक्षात्मक प्रणालियाँ निर्मित होती हैं। भविष्य के संघर्षों से जूझने की शक्ति आकार लेती है।
सप्तम मास – माँ कालरात्रि
अज्ञान के अंधकार का नाश करने वाली कालरात्रि की शक्ति शिशु में प्रकाश-बोध जगाती है। आँखें खुलती हैं, प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता जन्म लेती है।
अष्टम मास – माँ महागौरी
शरीर के समस्त अंग अपनी पूर्णता और शुद्धता की अंतिम कांति प्राप्त करते हैं।
नवम मास – माँ सिद्धिदात्री
नौ मास की तपस्या अपनी सिद्धि को प्राप्त करती है। प्रसव मात्र जैविक घटना नहीं, बल्कि हिरण्यगर्भ का पुष्प बनकर जगत्-उपवन में खिलना है। प्रथम रोदन कोई दुःख नहीं—वह सगुण चेतना के अवतरण का दिव्य जयघोष है।
यदि इस संपूर्ण यात्रा को सूक्ष्मता और प्रज्ञा से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि इसमें कहीं भी जड़ पदार्थ का कोई स्थान नहीं था। प्रत्येक कोशिका में वही आदि-शक्ति अपनी नौ कलाओं के साथ निरंतर नृत्यरत थी।
यह बोध कि “हम सदा उनकी गोद में हैं”—इस जैविक यात्रा का सबसे बड़ा और अखंड सत्य है।
जब मनुष्य स्वयं को उस आदि-शक्ति के चरणों में समर्पित कर देता है, तब उसके भीतर का वैज्ञानिक और भक्त एक ही बिंदु पर आकर मिल जाते हैं। वहीं से इस ‘नूतन उपनिषद’ का वास्तविक उदय होता है।
यह ज्ञान का वह गंगा-प्रवाह है जो हमें निरंतर स्मरण कराता है कि हम मात्र हाड़-मांस के पुतले नहीं, बल्कि उस अखंड चैतन्य के विस्तारित स्वरूप हैं, जो अपनी ही माँ की गोद में सुरक्षित रहकर इस विराट संसार का अनुभव कर रहे हैं।
‘पुरुषार्थ-कण’ और ‘कैवल्य-रज’ से प्रारंभ होकर ‘सिद्धि’ तक पहुँचने वाली यह कथा हमें विस्मय, कृतज्ञता और समर्पण के उस शिखर पर ले जाती है, जहाँ पहुँचकर समस्त शब्द मौन हो जाते हैं—और केवल परम आनंद शेष रह जाता है।
— अशोक तिवारी एवं अरुण तिवारी