एक धारा है ‘पुरुषार्थ-कण’, जो पिता की अनंत पीढ़ियों के संचित पुरुषार्थ, संघर्ष और उस संकल्प-शक्ति का वाहक है जो जीवन को गति प्रदान करती है। दूसरी धारा है ‘कैवल्य-रज’, जो माता की अगाध करुणा, सृजन की अपार सहनशीलता और चैतन्य की उस विशुद्धता को अपने भीतर समेटे हुए है, जिसमें भविष्य का मानचित्र अंकित है।