
मानव सभ्यता का इतिहास कोई ठहरा हुआ तालाब नहीं, बल्कि निरन्तर बहती हुई ऐसी नदी है, जिसका हर मोड़ अपने समय की आवश्यकताओं के अनुरूप एक नए आधुनिक युग को जन्म देता है। चेतना की इस विकासवादी यात्रा में सांस्कृतिक धरोहरें और महापुरुषों के विचार सभ्यता को आन्तरिक रूप से सुदृढ़ करने वाले पावन पड़ाव रहे हैं। वर्तमान वैज्ञानिक और सामाजिक युग अतीत के उस आत्मिक और वैचारिक संबल को साथ लेकर, जीवन की व्यावहारिक चुनौतियों को हल करने और अपनी अस्तित्वगत स्थितियों को बेहतर बनाने के मानवीय संघर्ष की सामूहिक साधना का परिणाम है। इतिहास की इन गौरवशाली स्मृतियों के प्रति गहरा आदरभाव रखते हुए, बिना किसी पूर्वाग्रह के आज के वैज्ञानिक धरातल के यथार्थ को देखना, उसे स्वीकारना और उस पर गर्व करना ही भविष्य के मार्ग को आलोकित करने की पहली अनिवार्य शर्त है।
अतीत के प्रति सहज और आत्मीय सम्मान चेतना का अभिन्न हिस्सा है। भारतीय वाङ्मय और मनीषा ने समय-समय पर जीवन जीने के अद्भुत सूत्र दिए हैं। वेदों ने सृष्टि के कौतुक, प्रकृति के विराट रूप और उसके मूलभूत रहस्यों को सामने रखा। शास्त्रों ने बुद्धि को तीक्ष्ण करने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म वैचारिक और तार्किक सूत्र रचे, जिससे जीवन की लीला को गहराई से समझा जा सके। इसके बाद, उन गूढ़ सिद्धान्तों को जनसामान्य के मानस के लिए सरल बनाने के उद्देश्य से पुराणों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने कथाओं और प्रतीकों के माध्यम से नैतिक शिक्षा दी।
इसी क्रम में महाकाव्यों के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने समाज को कर्तव्यों और धर्म की ठोस भूमि दी, तो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने आत्मा के उस शुद्ध, अनन्य और परम प्रेम के रंग बिखेरे, जो सांसारिक मोह से परे जीवन को शाश्वत आनन्द से भर देता है। जब मानव चेतना वैचारिक जटिलताओं में उलझने लगी, तब भगवान बुद्ध ने मनुष्य को ‘अप्प दीपो भव’—अपना दीपक स्वयं बनो—का कालजयी संदेश दिया और आन्तरिक सजगता की एक भव्य बौद्धिक क्रान्ति का आरम्भ किया।
इसी वैश्विक विकासवादी क्रम में पश्चिम की धरती पर ईसा मसीह का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने जाति, वर्ग और सीमाओं के बन्धनों को तोड़कर मानवता को परम करुणा, क्षमा और परस्पर सेवा का अनुपम सार्वभौमिक संदेश दिया। उन्होंने प्रेम को ईश्वर का जीवन्त रूप मानकर जनमानस के हृदय को एक नई आध्यात्मिक ऊर्जा से सींचा। इन महापुरुषों का आगमन सभ्यता के लिए महान वरदान था; उन्होंने मनुष्य को नैतिक गरिमा और आत्मिक बल से परिपूर्ण किया।
इन महान दर्शनों और महापुरुषों द्वारा दी गई कालजयी नैतिक शिक्षाओं को पूरी श्रद्धा के साथ आत्मसात् करते हुए मानव सभ्यता कभी रुकी नहीं। इन शिक्षाओं ने मनुष्य के चित्त को जो स्थिरता, आत्मविश्वास और वैचारिक तीक्ष्णता प्रदान की, उसी को आधार बनाकर मानवता अपने जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए निरन्तर सक्रिय रही। मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को केवल मूक दर्शक बनकर नहीं देखा; उसने उनमें निहित वैज्ञानिकता को पहचानना आरम्भ किया।
दैनिक जीवन के संघर्षों, प्राकृतिक आपदाओं और भौतिक सीमाओं से लड़ने के उपाय खोजने की सहज मानवीय जिजीविषा ने ही मनुष्य को प्रकृति के अकाट्य नियमों को समझने की प्रेरणा दी। यह मानव चेतना का सुन्दर और सकारात्मक विस्तार था, जहाँ नैतिक मूल्यों से सुसंस्कृत बुद्धि ने प्रकृति की शक्तियों को समझा और उन्हें व्यावहारिक धरातल पर उतारकर जीवन को सुगम, सुरक्षित और रोगमुक्त बनाने के उपाय खोजे। जिसे आज वैज्ञानिक उपलब्धि कहा जाता है, वह वास्तव में उसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की वैचारिक ऊर्जा और मानवीय कर्मठता की रचनात्मक परिणति है।
इस वैज्ञानिक धरातल के महत्त्व को समझने के लिए यदि इतिहास के पन्नों को देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अतीत में भौतिक संसाधनों की सीमाएँ थीं और आम मनुष्य का रोजमर्रा का जीवन आज की तुलना में कहीं अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण था। प्राचीन काल को अक्सर केवल दार्शनिक शान्ति और सांस्कृतिक वैभव के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन उस समय की प्राकृतिक और भौतिक विवशताएँ भी एक कठोर यथार्थ थीं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के उदय से पहले चेचक, हैजा, प्लेग और मलेरिया जैसी महामारियाँ जब भी मानवता की परीक्षा लेती थीं, तब प्रभावी उपचारों के अभाव में जनसामान्य को भारी कष्ट झेलना पड़ता था। मानवता के पास तब इन रोगों और सूक्ष्मजीवों के विज्ञान को समझने के साधन सीमित थे, और वह उन्हें प्रकृति की कठिन नियति मानकर सहने को विवश थी।
इसी प्रकार शिक्षा और सूचना का प्रसार भी उन युगों में अत्यन्त सीमित था। मुद्रण-प्रौद्योगिकी और आधुनिक संचार के अभाव में ज्ञान कुछ विशिष्ट केन्द्रों तक ही संचित था, जिससे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा बुनियादी साक्षरता और वैज्ञानिक समझ की सहज उपलब्धता से दूर था। आर्थिक मोर्चे पर यान्त्रिक उपकरणों की कमी के कारण मनुष्य को केवल अपनी बुनियादी आजीविका के लिए अत्यधिक कठिन शारीरिक श्रम करना पड़ता था। अकाल और प्रतिकूल मौसम के समय भोजन और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना अपने आप में एक बहुत बड़ा संघर्ष था।
इस विकासक्रम में यथार्थ का एक अन्य साहसिक पहलू यह भी रहा कि मानव समाज के ही एक वर्ग की सर्वथा अलग और सूक्ष्म दृष्टि ने इस मानवीय संघर्ष और प्राकृतिक विवशताओं को बहुत गहराई से देखा। जब-जब पारम्परिक सीमाओं ने नवीन विचारों के प्रवाह को रोकने का प्रयास किया, तब-तब इस खोजी मानस ने अपनी वैचारिक दृढ़ता से उन चुनौतियों को पार किया। उसने प्रकृति के नियमों को समझना आरम्भ किया, उनमें छिपी तार्किकता को पहचाना और जीवन के संघर्षों से जूझने के नए व्यावहारिक उपाय खोजे।
यह इतिहास विवशता का नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों को अपनी बौद्धिक क्षमता से परास्त करने वाले अपराजेय पुरुषार्थ का आख्यान है। इसी मूक साधना, अद्भुत जिजीविषा और सत्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के फलस्वरूप आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न एक प्रबुद्ध समाज उभरा, जिसने सम्पूर्ण मानवता के लिए अधिक सुगम, सुरक्षित और तार्किक जीवन-धरातल का निर्माण किया।
व्यावहारिक कठिनाइयों और भौतिक सीमाओं के इस युग को किसी आकस्मिक चमत्कार ने नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों से मिली वैचारिक तीक्ष्णता को धरातल पर उतारने की कठिन साधना, अनगिनत प्रयोगों और अन्वेषकों के अथक परिश्रम ने बदला है। विज्ञान ने प्रकृति के नियमों को समझा और उन्हें मानवता की सेवा में लगाया।
यहाँ यह सत्य पूरी प्रामाणिकता के साथ स्वीकार करना होगा कि आदर्शों ने जीवन को दिशा दी, किन्तु जीवन का हाथ उसके अपने पुरुषार्थ ने पकड़ा। इसी पुरुषार्थ के बल पर चिकित्सा विज्ञान ने अनेक भयानक महामारियों पर नियन्त्रण पाया और मनुष्य की औसत आयु में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। कृषि तकनीकों ने अन्न के संकट को कम किया, और यातायात तथा संचार के साधनों ने पूरी दुनिया को एक वैश्विक परिवार में पिरो दिया।
आज का सामान्य नागरिक शारीरिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और सामाजिक अवसरों के स्तर पर इतिहास के अधिकांश कालखण्डों के सम्पन्न व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक साधन-सम्पन्न जीवन जीता है। यह हमारे युग की भव्य और प्रत्यक्ष उपलब्धि है, जिस पर सम्पूर्ण मानवता को आत्मसम्मान के साथ गर्व होना चाहिए।
आने वाली पीढ़ियों के कल्याण और आगे की राह के लिए यह परम आवश्यक है कि हम केवल अतीत के गौरवगान में न खोए रहें, बल्कि आज के वैज्ञानिक और सामाजिक विकास को भी गहरे आदर और सम्मान के साथ स्वीकार करें। अतीत हमारी जड़ें हैं, हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान है; किन्तु आगे बढ़ने के लिए वर्तमान के तने और भविष्य की शाखाओं की ओर भी देखना होगा।
जब तक हमारी बुद्धि अतीत के रूमानी आकर्षण से बाहर निकलकर ‘यहाँ और अभी’ उपलब्ध वैज्ञानिक सुविधाओं, सामाजिक सुधारों और स्वतंत्रताओं का आदर करना नहीं सीखेगी, तब तक हम आने वाली पीढ़ियों के लिए नया और सुन्दर मार्ग नहीं बना पाएँगे। आज के इस ठोस, समृद्ध और जीवन्त धरातल पर गर्व करने से मानवीय चेतना में एक अनूठा और सकारात्मक उत्साह उत्पन्न होता है।
इसी गर्व और सम्मान के साथ सभ्यता का अगला कदम अत्यन्त स्पष्ट, सृजनात्मक और ऊर्जा से भरा होना चाहिए। विज्ञान और आधुनिक समाज ने हमें बीमारियों, अज्ञानता और कठिन शारीरिक श्रम के बोझ से जो मुक्ति दी है, उसका वास्तविक उद्देश्य यही है कि अब हमारे पास आत्मबोध के लिए और अधिक अच्छा मनुष्य बनने के लिए अधिक समय हो।
एल्गोरिद्म और संगणकीय बुद्धिमत्ता का वर्तमान विस्तार हमारी प्राचीन तार्किक परम्पराओं से संवाद करते हुए विकसित होने वाली आधुनिक वैज्ञानिक यात्रा का नवीनतम चरण है। उसका उद्देश्य कृषि, चिकित्सा, शिक्षा और नागरिक जीवन को अधिक सुगम और न्यायपूर्ण बनाना होना चाहिए।
इसके साथ ही भविष्य के विज्ञान को प्रकृति की इस अनन्त समग्रता के साथ गहरा तादात्म्य स्थापित करना होगा; क्योंकि प्रौद्योगिकी का लक्ष्य प्रकृति पर विजय पाना नहीं, बल्कि उसके भव्य और जीवन्त ताने-बाने के साथ गरिमामय सह-अस्तित्व स्थापित करना है।
हमें बाहरी सुख-सुविधाओं के विज्ञान को आन्तरिक शान्ति के अन्तर्विज्ञान से जोड़ना होगा। अतीत की सुन्दर स्मृतियों को पाथेय बनाकर और वर्तमान के इस आलोकित रथ पर सवार होकर यदि हम आगे बढ़ेंगे, तो मानवता एक अत्यन्त प्रबुद्ध, स्वस्थ और सामंजस्यपूर्ण विश्व का निर्माण कर सकती है।
यही आज की वास्तविक आवश्यकता है, और यही कल को सुन्दर बनाने का सबसे सहज और प्रगतिशील मार्ग है।
— डॉ. अशोक तिवारी
चेतना का पुरुषार्थ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उदय