परंतु, इस जगमगाती आधुनिकता के शिखर पर खड़े होकर हमें यह सहज ही आभास होता है कि आज हम जिस भव्य प्रासाद में सांस ले रहे हैं, उसकी नींव को खड़ा करने में इतिहास की न जाने कितनी गहरी और अनगिनत ईंटें समाहित हैं। यह डिजिटल फलक रातों-रात नहीं चमका, बल्कि इसके पीछे उज्जैन की गणितीय प्रज्ञा, चीन के माध्यम-आविष्कार, बगदाद के ज्ञान-गलियारे, यूनान के तर्कशास्त्र, यूरोप की औद्योगिक प्रयोगशालाएँ, कलकत्ता का तरंग-पुंज और अंततः सिलिकॉन वैली का तकनीकी पुरुषार्थ समाहित है। यह सीमाओं को लांघती प्रज्ञा की एक ऐसी महाद्वीपीय रिले-रेस है, जो यह सिद्ध करती है कि ज्ञान-विज्ञान एक सतत प्रवाह है।