करतलामलकम्: मुट्ठी में बंद ब्रह्मांड और चिरंतन सूत्र
प्रातःकाल की पहली किरण के साथ जब हमारी उंगलियाँ हथेली में थामे कांच के उस चमकदार फलक को छूती हैं, तो एक पूरा ब्रह्मांड जीवंत हो उठता है। पलक झपकते ही हजारों मील दूर बैठे आत्मीय की आवाज कानों में गूंजने लगती है और कुछ ही क्षणों में दुनिया के किसी भी कोने का ज्ञान हमारी आंखों के सामने तैरने लगता है। हम इस यंत्र को स्मार्टफोन कहते हैं—जो आज हर मुट्ठी में है, हर जेब का हिस्सा है और इस सदी का सबसे सहज यथार्थ है।
हमारे प्राचीन दर्शन में एक बहुत सुंदर शब्द आता है—करतलामलकम्। इसका अर्थ होता है किसी अत्यंत गूढ़, अमूर्त और ब्रह्मांडीय सत्य का साक्षात्, प्रत्यक्ष और इतना पारदर्शी अनुभव, जैसे खुली हथेली पर रखा हुआ आंवला। प्राचीन काल में यह शब्द ऋषियों के आत्म-साक्षात्कार और चेतना की परिभाषा था, जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड उनके भीतर प्रत्यक्ष हो जाता था। कितना विस्मयकारी विरोधाभास है कि आज भौतिक विज्ञान और डिजिटल एल्गोरिदम ने मिलकर उस आध्यात्मिक रूपक को एक व्यावहारिक और भौतिक सत्य में बदल दिया है। आज सचमुच संपूर्ण ब्रह्मांड हमारी हथेली में रखे आंवले की तरह दृश्यमान है। सूचनाओं का समंदर, खगोलीय चित्र, गणितीय गणनाएँ और वैश्विक संवाद—सब कुछ एक मुट्ठी में सिमट गया है।
परंतु, इस जगमगाती आधुनिकता के शिखर पर खड़े होकर हमें यह सहज ही आभास होता है कि आज हम जिस भव्य प्रासाद में सांस ले रहे हैं, उसकी नींव को खड़ा करने में इतिहास की न जाने कितनी गहरी और अनगिनत ईंटें समाहित हैं। यह डिजिटल फलक रातों-रात नहीं चमका, बल्कि इसके पीछे उज्जैन की गणितीय प्रज्ञा, चीन के माध्यम-आविष्कार, बगदाद के ज्ञान-गलियारे, यूनान के तर्कशास्त्र, यूरोप की औद्योगिक प्रयोगशालाएँ, कलकत्ता का तरंग-पुंज और अंततः सिलिकॉन वैली का तकनीकी पुरुषार्थ समाहित है। यह सीमाओं को लांघती प्रज्ञा की एक ऐसी महाद्वीपीय रिले-रेस है, जो यह सिद्ध करती है कि ज्ञान-विज्ञान एक सतत प्रवाह है
यह उपकरण वास्तव में हजारों वर्षों के सामूहिक मानवीय चिंतन, तपस्या और मेधा का सघन निचोड़ है। इस चमकती हुई स्क्रीन के पीछे हम उन मौन मनीषियों की वैचारिक धड़कन को स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं, जिन्होंने आधुनिक विज्ञान के उदय से बहुत पहले शून्य और अनंत को खोज निकाला था।
जब हम स्मार्टफोन की स्क्रीन पर किसी चित्र को छूते हैं या कोई संदेश भेजते हैं, तो पृष्ठभूमि में प्रकाश की गति से एक मौन संवाद होता है, जो अंततः दो अंकों—शून्य और एक—के बीच का एक अबाध नृत्य है। आज का कंप्यूटर विज्ञान इस बाइनरी सिस्टम को अपनी रीढ़ मानता है, परंतु आश्चर्य यह है कि इस डिजिटल भाषा की वर्णमाला ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ही ऋषि पिंगल ने अपने महान ग्रंथ 'छन्दःशास्त्र' में लिख दी थी। कविता के छंदों और उनके लघु-गुरु रूपों को समझने की गणितीय जिज्ञासा में उन्होंने जिस क्रमचय-संचय (Combinatorial methods) का आविष्कार किया, वह दुनिया का सबसे पहला बाइनरी कोड बना।
इसी गणितीय चेतना को आगे बढ़ाते हुए पांचवीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने स्थानीय मान पद्धति (Place-value system) और शून्य की आधारभूत महत्ता को स्थापित कर अंकगणित को एक अनंत आकाश दिया। परंतु शून्य को केवल एक अभाव या खाली स्थान न मानकर, उसे एक पूर्ण गणितीय इकाई के रूप में स्थापित करने का श्रेय सातवीं शताब्दी के महान खगोलविद और गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त को जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' में पहली बार यह समझाया कि शून्य पर गणितीय संक्रियाएँ कैसे लागू होती हैं और उन्होंने धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं के वे नियम बनाए जो आज कंप्यूटर के भीतर के लॉजिक गेट्स को संचालित करते हैं।
जब गणित का यह प्रवाह पश्चिम की ओर बढ़ा, तो इतिहास ने उन महत्वपूर्ण कड़ियों को जुड़ते देखा जिन्होंने आधुनिक ऑपरेटिंग सिस्टम का मार्ग प्रशस्त किया। नौवीं शताब्दी में बगदाद के गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी ने ब्रह्मगुप्त और आर्यभट्ट के इन क्रांतिकारी सिद्धांतों का अरबी में अनुवाद किया और समीकरणों को सुलझाने की जो व्यवस्थित पद्धति उन्होंने विकसित की, उसी से उनके नाम के लैटिन रूपांतरण से 'एल्गोरिदम' (Algorithm) शब्द का जन्म हुआ।
समय का पहिया जब सत्रहवीं शताब्दी में पहुंचा, तो गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज ने आधुनिक बाइनरी संख्या प्रणाली को औपचारिक रूप दिया, जबकि ब्लेज़ पास्कल ने दुनिया के पहले मैकेनिकल कैलकुलेटर का निर्माण किया। इसके बाद उन्नीसवीं शताब्दी में चार्ल्स बैबेज ने 'एनालिटिकल इंजन' का खाका तैयार किया, जिसे दुनिया का पहला जनरल-पर्पज कंप्यूटर माना जाता है। इस यांत्रिक शरीर में प्राण फूंकने का काम लेडी एडा लवलेस ने दुनिया का सबसे पहला कंप्यूटर प्रोग्राम लिखकर किया। उसी भारतीय शून्य और एडा लवलेस के काव्यात्मक विज्ञान का तार्किक विस्तार आज का सॉफ्टवेयर जगत है।
विचारों का यह अमूर्त आकाश जब भौतिक जगत में साकार होने लगा, तो इसके पीछे धरती का गहरा धातु-कर्म और रसायन विज्ञान था। एक स्मार्टफोन का शरीर आवर्त सारणी के सत्तर से अधिक दुर्लभ तत्वों (Rare Earth Elements) से मिलकर बना है। इस दिशा में प्राचीन भारतीय रसायनशास्त्री आचार्य नागार्जुन का योगदान अद्वितीय है। आज एक साधारण रेत के कण को अत्यंत शक्तिशाली सिलिकॉन चिप में बदल देने की कला इसी प्राचीन कीमिया का आधुनिक स्वरूप है।
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में दिमित्र्री मेंडेलीव ने अपनी आवर्त सारणी के माध्यम से तत्वों के अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया। इसी के परिणामस्वरूप आधुनिक वैज्ञानिक स्मार्टफोन में इंडियम, गैलियम और यूरोपियम जैसे दुर्लभ तत्वों का सटीक उपयोग कर सके।
इस भौतिक काया में गणना और समय की समझ फूंकने के लिए इतिहास ने ज्यामिति के महान चमत्कार देखे हैं। जब हम अपने फोन में जीपीएस (GPS) को देखते हैं, तो हमें राजस्थान की पवित्र भूमि पर खड़ा जंतर-मंतर स्मरण हो आता है। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित सम्राट यंत्र और जयप्रकाश यंत्र अपने समय के सुपरकंप्यूटर ही थे।
इस उपकरण को बिना किसी तार के हवा में संवाद करने की शक्ति देने के लिए विद्युत-चुंबकत्व (Electromagnetism) को साधा गया। माइकल फैराडे और जेम्स क्लर्क मैक्सवेल की खोजों के बाद महान वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चंद्र बोस ने १८९५ में पहली बार माइक्रोवेव का प्रदर्शन किया। आज हम जिस वाई-फाई, ब्लूटूथ और 5G नेटवर्क का आनंद ले रहे हैं, उसकी पहली तरंग जगदीश चंद्र बोस की उसी प्रयोगशाला से उठी थी।
बीसवीं शताब्दी में क्वांटम भौतिकी के उदय के साथ इस विकास यात्रा ने एक तीव्र मोड़ लिया। मैक्स प्लैंक, अल्बर्ट आइंस्टीन, जॉन बार्डिन, वाल्टर ब्रेटन, विलियम शॉकली, रॉबर्ट नोयस, जैक किल्बी, एलन ट्यूरिंग और क्लॉड शैनन ने मिलकर आधुनिक डिजिटल सभ्यता की नींव रखी।
इस महान यात्रा की अंतिम कड़ियाँ हमारे अपने समकालीन इतिहास से जुड़ी हैं। मार्टिन कूपर ने दुनिया का पहला पोर्टेबल सेल फोन बनाया। टिम बर्नर्स-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) का आविष्कार किया। अंततः, स्टीव जॉब्स ने २००७ में आईफोन के माध्यम से इस पूरी प्रज्ञा को एक ऐसी सुंदर काया में समेट दिया जो सीधे मनुष्य के व्यवहार से जुड़ गई।
यहाँ ठहरकर विचार करना आवश्यक है कि आज की तकनीक हमारे पूर्वजों के बौद्धिक पुरुषार्थ और वैश्विक संयोजन की ही परिणति है। जैसे हमारा जैविक अस्तित्व डीएनए (DNA) पर निर्भर है; वैसे ही यह तकनीक भी मानवता के बौद्धिक डीएनए का परिणाम है। मशीनें कितनी भी भव्य क्यों न हों, उन्हें आकार देने वाला असली चमत्कार मनुष्य का मस्तिष्क और उसकी चेतना ही है।
आज हमारी मुट्ठी में थमा वह उपकरण केवल कुछ ग्राम कांच और धातु नहीं, बल्कि मानवीय त्याग और प्रज्ञा का संचित सत्य है। इस आधुनिक प्रासाद के पीछे उज्जैन, बगदाद और कलकत्ता से लेकर सिलिकॉन वैली तक के सर्जकों का मौन समर्पण समाहित है। जब तक हम इस भौतिक करतलामलकम् को देखते हुए अपनी नींव की इन चिरंतन ईंटों के प्रति गहरे कृतज्ञता भाव से नहीं भर जाते, तब तक हम अपनी हथेली में सिमटे इस ब्रह्मांड की वास्तविकता और उसके पावन उद्देश्य को कभी नहीं समझ पाएंगे।
डॉ. अशोक तिवारी