
आधुनिक जीव विज्ञान और सनातन चेतना के विस्मयकारी संगम पर जब हम दृष्टिपात करते हैं, तो विज्ञान और अध्यात्म कोई दो भिन्न या विरोधी दिशाएँ नहीं, बल्कि एक ही शाश्वत सत्य को अभिव्यक्त करने वाली पूरक भाषाएँ हैं। आधुनिक विज्ञान अपने जिन उन्नत निष्कर्षों तक पहुँचता है, वे अध्यात्म की मूल अनुभूतियों की अनुगूंज हैं, जहाँ दोनों विधाओं के बीच गहरे बिंदु उभर कर आते हैं जो इस एकात्मता को सिद्ध करते हैं।
पहला बिंदु यह है कि विज्ञान जहाँ सदियों से पदार्थ को ही अंतिम सत्य मानता आ रहा था, वहीं आज आधुनिक विज्ञान यह स्वीकार करता है कि पदार्थ के भीतर छुपा हुआ स्पंदन (Vibration) ही मुख्य है—जिसे क्वांटम स्तर पर हम ऊर्जा तरंगों और आवृत्तियों के रूप में मापते हैं। यह स्पंदनात्मक यथार्थ अध्यात्म के 'प्राण तत्व' के सर्वथा निकट है। जैसा कि कठोपनिषद में प्रतिपादित किया गया है—एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति (कठोपनिषद 2.2.12)—अर्थात वह एक ही आंतरिक आत्मा या ऊर्जा सभी भूतों में वशीभूत होकर एक ही रूप को बहुधा प्रकट करती है। इसके साथ ही, सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं—जैसे पक्षियों का दिशा-ज्ञान या प्रकाश संश्लेषण—में होने वाले इन स्पंदनों और ऊर्जा स्थानांतरण के सूक्ष्म अध्ययन यह दर्शाते हैं कि भौतिक और चैतन्य जगत का यह अद्वैत प्रकृति के कण-कण में सक्रिय है।
दूसरा बिंदु यह है कि सनातन मनीषा जिसे 'चित्त की शुद्धि' और 'संस्कार' के रूप में अनुभव करती आई है, आधुनिक आनुवंशिकी का सबसे नवीनतम अध्याय—एपिजेनेटिक्स—ठीक उसी सत्य के समतुल्य है कि हमारा बाहरी वातावरण, हमारा भोजन, हमारे विचार और हमारे जीवन की प्रत्येक परिस्थिति केवल बाहरी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे सीधे हमारे जीनों की अभिव्यक्ति को प्रभावित करती हैं; वे यह तय करती हैं कि भीतर का कौन सा ब्लूप्रिंट जाग्रत होगा और कौन सा सुषुप्त रहेगा।
तीसरा बिंदु यह है कि अध्यात्म की यह मान्यता कि 'ब्रह्मांड की हर इकाई परस्पर जुड़ी हुई है', आज विज्ञान के 'क्वांटम एंटैंगलमेंट' और कोशिकीय स्तर पर 'सिग्नलिंग नेटवर्क्स' के रूप में सामने आती है, जहाँ ईशोपनिषद के इस सत्य—यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति, सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते (ईशोपनिषद,6)—की भाँति एक सिरे पर होने वाली हलचल दूसरे सिरे को स्वतः प्रभावित करती है। विज्ञान का यह प्रामाणिक डेटा और दर्शन का वह सूक्ष्म आत्मिक बोध दोनों एक ही धरातल पर आकर मिलते हैं कि जिसे हम नियति मान बैठे थे, वह वास्तव में एक गतिशील और चैतन्य व्यवस्था है। इस प्रकार, प्रयोगशाला के निष्कर्ष और चेतना के सूत्र एक ही लय में गूंजते हैं कि जीवन केवल भौतिक रसायनों का एक अंधा संघात नहीं, बल्कि समष्टि और व्यष्टि का एक अत्यंत परिष्कृत विन्यास है, जहाँ बाहरी परिवेश और आंतरिक सत्ता के बीच एक अखंड संवाद निरंतर गतिमान रहता है।
जैसे ही इस विस्मयकारी एकता से आगे का मार्ग प्रशस्त होता है, वैसे ही कोशिकीय धरातल पर एक सर्वथा नवीन और साफ रास्ता दिखाई देने लगता है। कोशिका की सतह पर मौजूद रिसेप्टर्स की संवेदनशीलता और उसके आंतरिक सिग्नलिंग पाथवे का यह सत्य यह स्पष्ट करता है कि बाहरी परिवेश चाहे कितना भी मुखर क्यों न हो, जब तक भीतर की ग्रहणशीलता सक्रिय नहीं होती, तब तक कोई भी संकेत रासायनिक परिवर्तन में नहीं बदलता। इसके समानांतर, अध्यात्म हमें चित्त पर पड़े पूर्व संस्कारों का बोध कराता है, जिसे आज की आधुनिक आनुवंशिकी 'एपिजेनेटिक स्मृति' के रूप में स्वीकार करती है। डीएनए के ऊपर लिपटे हिस्टोन प्रोटीनों का विशिष्ट संशोधन और मिथाइल समूहों का सूक्ष्म विन्यास ही वह कोशिकीय स्मृति है, जो यह तय करती है कि अतीत के संघर्षों और अनुभवों की पृष्ठभूमि में वर्तमान का कौन सा पन्ना खुलेगा। कोशिका के पास अपनी एक स्वतंत्र और चयनात्मक बुद्धिमत्ता है, जो यह निर्णय लेती है कि किस बाहरी संकेत को स्वीकार करना है। विज्ञान की यह कोशिकीय बुद्धिमत्ता श्रीमद्भगवद्गीता के उस शाश्वत रूपक को प्रतिध्वनित करती है जिसे 'क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ' कहा गया है—
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ (गीता 13.2)
जहाँ कोशिका का यह भौतिक आवरण 'क्षेत्र' है, और उसके भीतर बैठी चयनात्मक विवेक-शक्ति 'क्षेत्रज्ञ' है, जो अपने पुरुषार्थ से यह तय करती है कि परिवेश के किस प्रारब्ध को अंगीकार करना है। यह अध्यात्म कोई बाहरी अवधारणा नहीं, बल्कि विज्ञान के डेटा के विश्लेषण और उस विश्लेषण के अनुभव से रचे गए वाक्यों का ही प्रकटीकरण है।
परंतु इस प्रयोगशाला में विस्मय तब और गहरा हो जाता है जब तमाम उचित और अनुकूल परिवेश मिलने पर भी वह अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देता, जहाँ सारे वैज्ञानिक मापदंड होने के बावजूद कोशिका मौन रह जाती है और विज्ञान इस स्थिति को समझने के लिए इसे 'यादृच्छिकता' या 'संभाव्यता-आधारित व्यवहार' जैसी संज्ञाएं देता है। मुण्डक उपनिषद का वह महान सूत्र यहीं प्रासंगिक हो उठता है—
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्। (मुण्डक उपनिषद 1.2.12)
अर्थात, उस विशेष विज्ञान को जानने के लिए जिज्ञासु को उस आंतरिक विवेक की शरण में जाना ही होता है, जहाँ सूचनाएं केवल डेटा नहीं रहतीं बल्कि साक्षात्कार बन जाती हैं। चेतना के इस धरातल पर वेदान्त सूत्र का वह आदि शंखनाद गूंजता है—अथातो ब्रह्म जिज्ञासा—अर्थात, अब ब्रह्म को जानने की, उस परम सत्य को टटोलने की शुरुआत होती है। खोजने और जानने की यही उत्कट जिज्ञासा ब्रह्मांड में निरंतर बनी रहती है, और यही अविराम चक्र इस पूरे जीवन को हर क्षण सर्वथा नवीन और जीवंत बनाए रखता है।
यही कारण है कि विज्ञान प्रयोगशाला के डेटा में और अध्यात्म ध्यान के शून्याकाश में जिस सत्य की निरंतर खोज कर रहे हैं, वह कोई अमूर्त तत्व नहीं है। वह सत्य वास्तव में साक्षात जीवंत रूप में हमारे भीतर धड़क रही वही धड़कन और प्राण हैं जो प्रतिपल इस अस्तित्व को स्पंदित रख रहे हैं। जैसा कि प्राचीन आचार्यों का उद्घोष है—प्राणो ब्रह्मेति (तैत्तिरीयोपनिषद् 3.3.1)—अर्थात यह प्राण ही ब्रह्म है। जीवन की जिजीविषा इस सत्य को किसी एक निश्चित निष्कर्ष की मुट्ठी में बंद कर लेने में नहीं, बल्कि इस धड़कन और श्वांस के साथ बहने के अनंत विस्मय में है।
ऐतरेय ब्राह्मण का यह पवित्र मंत्र इस शाश्वत गति को जीवंत करता है—
आस्ते भग आसीनस्य ऊर्ध्वं तिष्ठति तिष्ठतः। शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगः॥ चरैवेति चरैवेति॥ (ऐतरेय ब्राह्मण 7.15.3)
यह ‘चरैवेति’ की शाश्वत गति इस प्राणाधार अस्तित्व की वास्तविक धड़कन है, जो चेतना को कभी शिथिल नहीं होने देती। और यही इस पूरे विमर्श का महा-समापन सूत्र है कि वह जीवन ही है जिसे ब्रह्म के रूप में जानने की जिज्ञासा वेदांतों में हुई, और वही जीवन जीव विज्ञान की जिजीविषा भी है। जब तक खोजने और जीने का यह कौतूहल बना हुआ है, तब तक यह सृष्टि अंतहीन संभावनाओं का एक गतिशील रंगमंच है, जहाँ हर पड़ाव एक नई यात्रा का निमंत्रण है, और इसीलिए सनातन मनीषा का वह उद्घोष इस यात्रा को हमेशा ऊर्जस्वित रखता है—चरैवेति चरैवेति—अर्थात, चलते रहो, निरंतर बढ़ते रहो, क्योंकि गति ही जीवन का असली सत्य और परम आनंद है।
— डॉ. अशोक तिवारी
अनंत स्पंदन: विज्ञान और अध्यात्म का संगीत