
“जीवन का उद्देश्य क्या है ?” यह प्रश्न प्रत्येक विचारशील मन में जीवन के किसी न किसी चरण पर अवश्य उठता है। इसका उत्तर प्रायः इस बात पर निर्भर करता है कि यह प्रश्न हमारे भीतर कब जाग्रत हुआ।
प्राचीन भारतीय चिंतन ने जीवन को चार आश्रमों के गहन और सुविचारित ढाँचे में देखा—विद्यार्थी जीवन, गृहस्थ जीवन, वह अवस्था जब उत्तरदायित्व और निर्णय अगली पीढ़ी को सौंपे जाने लगते हैं, और अंततः संन्यास, जिसमें व्यक्ति सक्रिय सामाजिक जीवन से भी धीरे-धीरे विरत हो जाता है। प्रत्येक अवस्था चेतना के विस्तार की तैयारी है, जिसकी चरम परिणति “मैं” और “मेरा” की संकीर्णता से मुक्त, सागर जैसी व्यापक अनुभूति में होती है।
सनातन धर्म के दो समर्पित साधकों और असाधारण योगदान देने वाले प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों द्वारा लिखी गई यह पुस्तक आधुनिक युवा पीढ़ी के लिए एक विशिष्ट संदेश प्रस्तुत करती है। यह जीवन के रहस्य को अनावश्यक धार्मिक जटिलताओं और दार्शनिक शब्दाडंबर से मुक्त कर एक स्पष्ट और सुबोध अभिव्यक्ति देती है—चेतना का विस्तार।
जीवन के प्रत्येक क्षण में हमारा प्रयास अपनी चेतना की सीमाओं को विस्तृत करना होना चाहिए—“मैं और मेरा” से आगे बढ़कर अपने आसपास के लोगों तक; स्वार्थ से समष्टि-कल्याण तक; स्थानीय से वैश्विक तक; क्षणिक से शाश्वत तक; और उपभोग से सततता तक।
इस दृष्टि से जीवन का उद्देश्य केवल अधिक प्राप्त करना नहीं, बल्कि अधिक व्यापकता से जुड़ने, समझने और अपनाने योग्य बनना है।
पुस्तक उपलब्ध है: https://www.prabhatbooks.com/jeevan-param-chetna-ka-vistar.htm
जीवन का उद्देश्य क्या है ?