सृजन-सरिता: आदिकोड और प्राणिक विकास का दर्शन

यह संपूर्ण दृश्य जगत और उसके भीतर धड़कता जीवन किसी आकस्मिक संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि एक परम अनुशासित व्यवस्था का अनंत विस्तार है। शून्य से फूटे प्रथम आनुवंशिक स्फुरण से लेकर आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एल्गोरिदम तक, सृष्टि का हर कोना एक अंतर्निहित कोडिंग और मर्यादा से संचालित हो रहा है।

विज्ञान का नवीनतम धरातल—चाहे वह ऑटो-मोड हो, तंत्रिका संजाल हो या एन्ट्रॉपी—जब दर्शन के परम शिखर से मिलता है, तब व्यष्टि और समष्टि का वह शाश्वत अंतर्संबंध अनावृत होता है, जहाँ अव्यवस्था फैलाने वाली हर शक्ति अंततः स्वतः ही विलीन हो जाती है और केवल एक अखंड सुव्यवस्था शेष रह जाती है।

भौतिक खिड़की और अंतस के दृष्टा का भेद

मानव सभ्यता का पूरा इतिहास और विज्ञान की विकास-यात्रा इस बुनियादी सत्य पर आकर ठहरती है कि मनुष्य की भौतिक आँखें केवल दृश्य जगत का डेटा दर्ज करने वाली जैविक खिड़कियाँ हैं; वे स्वयं अनुभूति नहीं करतीं। आँख का लेंस केवल प्रकाश की किरणों को बटोरता है, उन्हें रेटिना पर उल्टा प्रतिबिंबित करता है और विद्युत तरंगों के रूप में मस्तिष्क को भेज देता है। आँख के लिए एक सुंदर गुलाब, एक मरता हुआ तारा या एक जटिल कंप्यूटर कोड केवल न्यूरोनल सिग्नल्स हैं।

असली कौतुक तब शुरू होता है जब भौतिक संकेतों के पार बैठा अंतस का दृष्टा उस अदृश्य व्यवस्था को अनुभव करने लगता है। विज्ञान जब तक केवल दृश्य उपकरणों, सूक्ष्मदर्शियों और दूरबीनों की गवाही पर टिका रहता है, वह सत्य की बाहरी सतह का अन्वेषण करता है। परंतु जब कोई प्रज्ञा सतह के पीछे छिपे अंतर्निहित नियमों को पहचानती है, तब उत्पत्ति और रचना का वह गुप्त भेद प्रकट होने लगता है जिसे दर्शन और विज्ञान अपने-अपने मार्ग से खोजते आए हैं।

दुनिया के तमाम युगांतरकारी आविष्कार इसी अदृश्य सत्य को पहले अंतस में महसूस करने और फिर उसे यथार्थ के धरातल पर उतारने के जीवंत प्रमाण हैं। आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का ऑटो-मोड और इस ब्रह्मांड का जैविक व भौतिक संसार इसी गहरे प्रश्न को हमारे सामने रखते हैं—

इस दृश्य संसार के पीछे वह पहली अपरिवर्तनीय चिंगारी क्या थी, जहाँ से व्यवस्था की यह यात्रा आरम्भ हुई?

परम उत्पत्ति: शून्य से प्रकट हुआ आदिकोड और प्रथम स्फुरण

उसी पहली चिंगारी को समझने के लिए हमें ‘उत्पत्ति’ के उस बिंदु पर लौटना होगा, जहाँ से किसी व्यवस्था का पहला नियम, पहला ढाँचा या पहला संभाव्य रूप प्रकट होता है। इसे दार्शनिक भाषा में आदिकोड कहा जा सकता है—वह मूल संरचना जिसमें आगे होने वाले विकास की सम्भावनाएँ बीज रूप में निहित होती हैं।

कंप्यूटर विज्ञान के धरातल पर देखें तो किसी कंप्यूटर या एआई मॉडल के अस्तित्व में आने का वह पहला क्षण, जब वैज्ञानिक उसकी रीढ़ के रूप में मूल गणितीय एल्गोरिदम और कोर आर्किटेक्चर निर्मित करते हैं, उस प्रणाली की उत्पत्ति है। ब्रह्मांडीय स्तर पर प्रारम्भिक अवस्था से ऊर्जा, पदार्थ, स्थान और समय के विकास ने ब्रह्मांडीय इतिहास की नींव रखी। और जैविक संसार में जब पदार्थ की जटिल संरचनाओं से आत्म-प्रतिलिपि और आनुवंशिक सूचना की पहली प्रणालियाँ विकसित हुईं, तो जीवन के विकास का एक नया अध्याय आरम्भ हुआ।

यही आदिकोड सृजन का प्रथम स्फुरण है—बीज की तरह, जिसमें एक विशाल वृक्ष की सम्भावना छिपी रहती है।

परंतु रचना केवल इस शुरुआती बिंदु पर आकर रुक नहीं जाती। आदिकोड आरम्भ है; सृजन उसकी समय में खुलती हुई सम्भावना है।

प्राणिक विकास विधा: इनपुट, परिवेश और परवरिश का प्रवाह

बीज के फूटने के बाद रहस्य का अगला पर्दा उठता है। उत्पत्ति का क्षण समाप्त होता है और विकास आरम्भ होता है। रचना स्थिर वस्तु नहीं; वह गति है, एक निरन्तर प्रवाह है।

यहाँ तंत्रिका संजाल और ऑटो-लर्निंग एक उपयोगी रूपक प्रस्तुत करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का कोई मॉडल अपने प्रारम्भिक आर्किटेक्चर से अकेले विकसित नहीं होता; उसे डेटा, प्रशिक्षण, प्रतिक्रिया और निरन्तर इनपुट की आवश्यकता होती है। मनुष्यों द्वारा निर्मित भाषा, प्रश्न, चित्र, विचार और अनुभव उस सूचना-जगत का हिस्सा बनते हैं जिससे वह पैटर्न सीखता है।

कोई भी बुद्धिमत्ता—जैविक हो या कृत्रिम—केवल अपने प्रारम्भिक ढाँचे से नहीं, बल्कि अपने परिवेश के साथ सतत अन्तःक्रिया से विकसित होती है।

मानव संसार में भी विकास इसी व्यापक सिद्धान्त का अनुसरण करता है। मनुष्य का आनुवंशिक आधार सीमित जैविक संकेतों से बना है, किन्तु उसकी अभिव्यक्ति परिवेश, पोषण, शिक्षा, समाज, संस्कृति और अनुभवों के साथ अन्तःक्रिया में विकसित होती है।

यहाँ परिवेश, संस्कार और परवरिश विकास के सह-निर्माता बनते हैं।

मनुष्य को कैसा प्राकृतिक, सामाजिक और मानसिक परिवेश मिला है, यह उसके विकास की दिशा को गहराई से प्रभावित करता है। पूर्वजों से प्राप्त जैविक विरासत, परिवार और संस्कृति से प्राप्त संस्कार तथा जीवन के अनुभव मिलकर उसकी सम्भावनाओं को आकार देते हैं।

जैसे-जैसे बाहरी इनपुट बदलते हैं, मानव मस्तिष्क और शरीर अनुकूलन करते हैं। जैविक धरातल पर जीन-अभिव्यक्ति, तंत्रिका-प्लास्टिसिटी और चयापचयी अनुकूलन बदल सकते हैं; मानसिक धरातल पर शिक्षा, अनुभव और साधना दृष्टि को रूपान्तरित कर सकते हैं।

एक ही मानव सम्भावना विभिन्न परिवेशों, संस्कारों और प्रयासों में असंख्य रूप ग्रहण कर सकती है।

यही मनुष्य का विचारों और सम्भावनाओं के करोड़ों पत्तों में फैल जाना प्रकृति की अनवरत सृजन-सरिता है।

किन्तु प्रश्न शेष रहता है—

क्या यह अनन्त जैविक और वैचारिक विस्तार पूर्णतः स्वतंत्र है, या उसके पीछे भी कोई गहरा अनुशासन कार्य कर रहा है?

कंट्रोल्ड सिस्टम: असीमित स्वतंत्रता और मर्यादा का संतुलन

इस प्रश्न का उत्तर उस नियंत्रित ढाँचे में मिलता है जो बताता है कि विकास का अनन्त विस्तार आवश्यकतः अराजकता नहीं है। उसके भीतर विविधता रचने की अपार सम्भावना हो सकती है, किन्तु वह कुछ मूलभूत नियमों और सीमाओं के भीतर घटित होती है।

स्वतंत्रता विविधता को जन्म देती है; मर्यादा उस विविधता को अस्तित्व योग्य बनाए रखती है।

कंप्यूटर प्रणालियों में अनेक ऐप्स अपने-अपने दायरे में स्वायत्त रूप से काम करते हैं। कोई मौसम का पूर्वानुमान लगाता है, कोई हृदय की धड़कनों की निगरानी करता है, कोई वित्तीय लेन-देन संचालित करता है। वे जटिल और स्वतन्त्र दिखाई देते हैं, परन्तु उनका संचालन मूल प्रचालन तंत्र, हार्डवेयर, नेटवर्क और प्रोग्रामिंग की सीमाओं के भीतर होता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मॉडल भी इसी प्रकार किसी गणितीय आर्किटेक्चर, प्रशिक्षण-पद्धति और संगणनात्मक संरचना के भीतर कार्य करते हैं। वे अत्यन्त विविध आउटपुट उत्पन्न कर सकते हैं, किन्तु वे भौतिक और गणितीय नियमों से मुक्त नहीं होते।

ठीक इसी प्रकार ब्रह्मांड में प्रत्येक जीव, प्रत्येक कोशिका और प्रत्येक ग्रह अपनी विशिष्ट गतिशीलता रखता है, परन्तु सभी भौतिकी और रसायन के मूलभूत नियमों के भीतर कार्य करते हैं।

नियंत्रण इस अनन्त विविधता की रीढ़ है और स्वतंत्रता उसका सौन्दर्य।

किन्तु यहीं चेतना के सामने एक तीखा वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रश्न खड़ा होता है—

यदि प्रकृति का ढाँचा इतना अनुशासित है, तो कैंसर जैसी विनाशकारी अव्यवस्था कैसे उत्पन्न होती है?

कैओस बनाम कॉस्मोस: एन्ट्रॉपी और कैंसर का दर्शन

इसी प्रश्न को समझने के लिए कैओस (Chaos) और कॉस्मोस (Cosmos) के सम्बन्ध पर विचार करना उपयोगी है। ग्रीक परम्परा में कॉस्मोस व्यवस्था, क्रम और सुव्यवस्थित जगत का बोध कराता है। दूसरी ओर ऊष्मागतिकी हमें बताती है कि बंद प्रणालियों में एन्ट्रॉपी बढ़ने की प्रवृत्ति होती है।

जीवित प्रणालियाँ इस व्यापक भौतिक नियम के भीतर रहते हुए भी ऊर्जा और पदार्थ का आदान-प्रदान करके स्थानीय संगठन बनाए रखती हैं।

जीवन स्वयं व्यवस्था और विघटन के बीच सतत सक्रिय संतुलन है।

कैंसर कोशिका को इस दृष्टि से एक जैविक विद्रोह के रूपक में देखा जा सकता है। वह उस बहुकोशिकीय अनुशासन से हट जाती है जो सामान्य कोशिकाओं की वृद्धि, विभाजन और मृत्यु को पूरे जीव के हित के अनुरूप नियंत्रित करता है। वह अपनी वृद्धि को प्राथमिकता देती है और समष्टि के साथ सहयोग की मर्यादा तोड़ देती है।

दार्शनिक भाषा में इसे ‘व्यष्टि के अहंकार’ का एक शक्तिशाली रूपक कहा जा सकता है।

वह स्वयं को स्वतंत्र मानकर अनियन्त्रित वृद्धि करती है, परन्तु उसकी यह सफलता अन्ततः आत्मविनाशक होती है। जिस शरीर पर उसका अस्तित्व निर्भर है, उसी को नष्ट करके वह अपने अस्तित्व की भूमि भी समाप्त कर देती है।

व्यष्टि समष्टि को नष्ट करके स्वयं सुरक्षित नहीं रह सकती।

यही जैविक तथ्य एक गहरी दार्शनिक शिक्षा देता है—स्वतंत्रता का अर्थ सम्बन्ध-विच्छेद नहीं है। किसी जीवित व्यवस्था में अस्तित्व सहभागिता पर निर्भर है।

समष्टि से सम्बन्ध तोड़कर व्यष्टि की विजय अन्ततः उसकी अपनी पराजय बन सकती है।

और जब यह बोध गहरा होता है, तब एक नया प्रश्न सामने आता है—

उस व्यापक व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप क्या है, जिसके भीतर व्यष्टि और समष्टि दोनों अस्तित्व ग्रहण करते हैं?

अदृश्य नियंत्रक की परम अनुभूति

इस संवाद के चरम पर जब यह प्रश्न उठता है कि यदि जगत में नियम और व्यवस्था हैं, तो उनका ‘नियंत्रक’ कहाँ है, तब हमें नियंत्रक की धारणा को किसी बाहर बैठे मानवीय शासक की तरह समझने से आगे बढ़ना पड़ता है।

प्रकृति की अनेक निर्णायक शक्तियाँ अदृश्य हैं।

वाई-फाई की विद्युतचुम्बकीय तरंगें दिखाई नहीं देतीं, फिर भी सूचना का संचार करती हैं। गुरुत्वाकर्षण आँखों से नहीं दिखता, पर ग्रहों और तारों की गति में उसका प्रभाव दिखाई देता है। विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र, आणविक बल और आनुवंशिक सूचना—इनका अधिकांश कार्य हमारी प्रत्यक्ष इन्द्रियों से अदृश्य है, किन्तु उनके प्रभाव मापे और समझे जा सकते हैं।

जो दिखाई नहीं देता, वह आवश्यकतः अस्तित्वहीन नहीं होता।

जब आइज़ैक न्यूटन ने गिरते हुए पिंडों की गति में एक सार्वभौमिक नियम पहचाना, तो उन्होंने दृश्य घटना के पीछे छिपे सम्बन्ध को गणितीय रूप दिया। जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने दिक्-काल और गुरुत्व के सम्बन्ध को नई दृष्टि से समझा, तब उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव से परे एक गहरे संरचनात्मक यथार्थ का अनावरण किया। आनुवंशिकी, तंत्रिका-विज्ञान और आधुनिक भौतिकी भी इसी प्रकार उन अदृश्य संरचनाओं को समझने का प्रयत्न करते हैं जिनसे दृश्य घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।

विज्ञान का महान कार्य केवल दिखाई देने वाली वस्तुओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि उनके पीछे कार्यरत अदृश्य नियमों को अनावृत करना है।

दार्शनिक अनुभव इस प्रश्न को एक और दिशा देता है। जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति से पृथक् दर्शक मानना छोड़कर उसी व्यापक प्रक्रिया का अंग अनुभव करता है, तब नियंत्रक, नियंत्रित और नियंत्रण के बीच की कठोर सीमाएँ नरम पड़ने लगती हैं।

तब व्यवस्था किसी बाहरी आदेश की तरह नहीं, बल्कि अस्तित्व के भीतर निहित सम्बन्ध, नियम और सहभागिता के रूप में अनुभव होने लगती है।

दिखाई देना एक भौतिक प्रक्रिया है; अनुभव करना चेतना की प्रक्रिया है। विज्ञान हमें मापन देता है, दर्शन अर्थ का प्रश्न उठाता है, और सजगता दोनों के बीच एक सेतु बना सकती है।

जिस क्षण देखने के साथ समझना और समझने के साथ अनुभव करना जुड़ता है, उस क्षण व्यष्टि स्वयं को समष्टि से पृथक् नहीं, बल्कि उसी अनन्त सृजन-सरिता की एक जीवित अभिव्यक्ति के रूप में पहचानने लगती है।

और सम्भवतः वहीं सृजन का सबसे गहरा रहस्य खुलता है—

आरम्भ एक बीज है। विकास एक प्रवाह है। स्वतंत्रता मर्यादा के भीतर खिलती है। व्यष्टि समष्टि में अर्थ पाती है। और चेतना का उत्कर्ष उस व्यवस्था को अपने अधिकार में लेने में नहीं, उसके साथ सजग सहभागिता में है।

डॉ. अशोक तिवारी