यदा यदा हि धर्मस्य: महाभारत का जैविक पुनर्जन्म एवं एपिजेनेटिक शुद्धिकरण

सनातन संस्कृति की कालजयी गाथाएँ केवल ऐतिहासिक घटनाक्रम या धार्मिक आख्यान नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के अत्यंत गूढ़ और अपरिवर्तनीय नियमों के जीवंत दस्तावेज़ हैं। महाभारत का महायुद्ध और कुरुवंश का उत्थान-पतन इसी सत्य का साक्षात् प्रमाण है। जब हम इस महाकाव्य को आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हस्तिनापुर के सिंहासन का संघर्ष वास्तव में एक विराट आनुवंशिक युद्धशाला के रूप में उभरता है। यह आलेख श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत सूत्रों, सुश्रुत संहिता के चिकित्सा सिद्धांतों और आधुनिक एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) एवं सिस्टम्स बायोलॉजी के संधिकाल पर खड़ा होकर कुरुवंश की उस यात्रा का विश्लेषण करता है, जहाँ प्रकृति ने स्वयं हस्तक्षेप करके आनुवंशिक भार (Genetic Burden) को साफ किया और एक परम शुद्ध चेतना के प्रस्थान का मार्ग प्रशस्त किया।

'यदा यदा हि' की वैज्ञानिक मीमांसा और प्रकृति का आनुवंशिक नियम

सनातन वांग्मय में योगेश्वर श्रीकृष्ण का वह अमर उद्घोष, जिसे युगों से केवल एक आध्यात्मिक प्रतिज्ञा या धार्मिक आश्वासन के रूप में देखा गया है, वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में इस प्रकार श्लोकबद्ध है:

यदा यदा हि धर्मस्य | ग्‍लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य | तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता, ४.७)

परित्राणाय साधूनां | विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय | सम्भवामि युगे युगे ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता, ४.८)

जब हम इस विराट घोषणा को आधुनिक जीव विज्ञान (Modern Biology), एपिजेनेटिक्स (Epigenetics) और जीनोमिक्स के चश्मे से देखते हैं, तो यह प्रकृति का एक अकाट्य आनुवंशिक नियम (Biological Law) सिद्ध होता है। यहाँ 'धर्म की ग्लानि' का वैज्ञानिक अर्थ है—किसी जीव-तंत्र, कुल या प्रजाति के भीतर आनुवंशिक अशुद्धि, हानिकारक उत्परिवर्तन (Mutagenic Load) और मानसिक-शारीरिक विकृतियों का संचय। इसके विपरीत, 'अधर्म का अभ्युत्थान' उस सीमा को दर्शाता है जहाँ यह संचित जैविक भार (Genetic Burden) समूचे तंत्र के अस्तित्व के लिए संकट बन जाता है।

विकासवादी जीवविज्ञान के धरातल पर, महान वैज्ञानिक रोनाल्ड फिशर का नियम (Fisher's Fundamental Theorem of Natural Selection) स्पष्ट करता है कि किसी भी तंत्र की उत्तरजीविता उसकी आनुवंशिक विविधता और अनुकूलन क्षमता पर निर्भर करती है। जब कोई तंत्र अपनी यह क्षमता खोकर केवल रुग्णता का संचय करने लगता है, तो प्रकृति समूचे कुल का 'सिस्टम्स कोलाप्स' (Systems Collapse) कर देती है। जब तंत्र का यह पतन निश्चित हो जाता है, तो 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' के सिद्धांत के अनुसार, प्रकृति स्वयं एक 'Divine Biological Intervention' (दैवीय जैविक हस्तक्षेप) के रूप में प्रकट होती है। यह हस्तक्षेप पुराने, अनुपयोगी और विषैले डीएनए प्रवाह का विसर्जन (विनाशाय च दुष्कृताम्) करता है और शुद्ध, नूतन आनुवंशिक ब्लूप्रिंट को बचाकर (परित्राणाय साधूनाम्) एक सर्वथा नवीन प्रजातीकरण या प्रस्थान (New Speciation) का मार्ग प्रशस्त करता है। महाभारत की पूरी कथा इसी जैविक पुनर्गठन और एपिजेनेटिक शुद्धिकरण का साक्षात् वैज्ञानिक इतिहास है।

आयुर्वेद के महान मनीषी सुश्रुत ने सदियों पहले कोशिकाओं के भीतर संचित होने वाली इसी मानसिक और जैविक स्मृति (Cellular Memory) को दो परम प्रामाणिक सूत्रों में रेखांकित किया था, जो आधुनिक जीव विज्ञान के धरातल को स्पष्ट आधार देते हैं। महर्षि सुश्रुत शारीरस्थान में स्पष्ट कहते हैं:

यद्गुणा स्वल्पभूयिष्ठा मात्रा भवति संसृष्टे । तद्गुणाधिक्यसम्पन्नं ततो जायते मानवः ॥ (सुश्रुत संहिता, शारीरस्थान, अध्याय २, श्लोक ३८)

अर्थात्, गर्भधारण के समय (संसृष्टे) शुक्र और शोणित के मिलन काल में, जिस गुण (दोष या महाभूत) की मात्रा सबसे अधिक या प्रधान (स्वल्पभूयिष्ठा - अल्प अंशों से बची हुई अर्थात् सर्वाधिक) होती है, होने वाला मनुष्य उसी गुण की अधिकता से युक्त (तद्गुणाधिक्यसम्पन्नं) पैदा होता है। इसी से व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक 'प्रकृति' (Constitution) का निर्धारण होता है। इस सिद्धांत को और अधिक व्यावहारिक धरातल पर ले जाते हुए वे आगे परिवेशीय प्रभाव को इस प्रकार स्पष्ट करते हैं:

आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ । स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ॥ (सुश्रुत संहिता, शारीरस्थान, अध्याय २, श्लोक ४६)

अर्थात्, संतानोत्पत्ति (गर्भाधान) के समय स्त्री और पुरुष जिस प्रकार के भोजन (आहार), आचरण (आचार) और शारीरिक-मानसिक चेष्टाओं से युक्त होकर एक-दूसरे से मिलते हैं, उनकी संतान भी ठीक वैसी ही प्रवृत्तियों और गुणों वाली पैदा होती है। ये वैज्ञानिक सत्य स्पष्ट करते हैं कि गर्भाधान के क्षण में और उससे पूर्व माता-पिता का आचार, आहार और चेष्टा जैसी होती हैं, ठीक उसी परिवेशीय और सेलुलर स्मृति (Cellular Memory) के आधिक्य से युक्त संतान का जन्म होता है। माता-पिता की तात्कालिक मानसिक स्थिति और उनका एपिजेनेटिक वातावरण ही आने वाली संतति के जीनोम एक्सप्रेशन (Genome Expression) को तय करता है। यदि विचार भय, ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा के हैं, तो वे डीएनए के मिथाइलेशन (DNA Methylation) को प्रभावित कर आनुवंशिक विकृतियों को जन्म देते हैं।

सत्यवती की महत्वाकांक्षा और कुरुवंश का आनुवंशिक ह्रास

कुरुवंश के पतन की पृष्ठभूमि को समझने के लिए प्रत्येक चरित्र की मानसिक स्थिति, उसके आचार-आहार-चेष्टा और उसकी सेलुलर मेमोरी का विश्लेषण अनिवार्य है। शांतनु का मूल वाई-क्रोमोसोम (Y-Chromosome) विचित्रवीर्य की असमय मृत्यु के साथ ही पूरी तरह विलुप्त हो चुका था। इसके बाद महर्षि व्यास (ऋषि पराशर के पुत्र) के माध्यम से जो नियोग हुआ, वह कुरुवंश के नाम पर एक नया गुणसूत्र प्रवाह था।

किंतु गर्भाधान के समय की चेष्टा और भय ने भयानक एपिजेनेटिक प्रभाव डाले। महर्षि व्यास के भयानक रूप को देखकर भय और संकोच से जब अंबिका ने अपनी आँखें बंद कर लीं, तो उस अत्यधिक मानसिक तनाव (Maternal Stress) और भय की सेलुलर मेमोरी ने भ्रूण में दृष्टि संबंधी तंत्रिकाओं (Optic Nerves) के जीन एक्सप्रेशन को अवरुद्ध कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप जन्मजात अंधत्व से ग्रस्त धृतराष्ट्र का जन्म हुआ।

ठीक इसी प्रकार, भय और संकोच के कारण जब अंबिका की बहन अंबालिका का शरीर पूरी तरह पीला (रक्तहीन) पड़ गया, तो कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन के संश्लेषण and रक्त संचार से जुड़ी प्रणालियों का एपिजेनेटिक दमन हो गया, जिससे जन्मजात शारीरिक दुर्बलता और अनीमिया (Anemia) से ग्रस्त पाण्डु का जन्म हुआ।

यही परिवेशीय स्मृति धृतराष्ट्र की अंध महत्वाकांक्षा, साम्राज्यवादी ईर्ष्या और गांधारी के मानसिक द्वंद्व (आँखों पर पट्टी बांधने का अवसाद) के बीच विकास पाकर दुर्योधन और उसके सौ भाइयों के रूप में प्रगट हुई। यह माता-पिता की संचित नकारात्मक सेलुलर मेमोरी का चरम प्रकटीकरण था, जिसने न्यूरोट्रांसमीटरों का ऐसा असंतुलन पैदा किया जो केवल अहंकार और मानसिक अशुद्धि के रूप में सामने आया। जीव विज्ञान में इसे हम 'आउटब्रीडिंग डिप्रेशन' या कुरुवंश का आनुवंशिक ह्रास (Genetic Regression) कहेंगे, जहाँ तंत्र अपनी जीवनी शक्ति खो चुका था। यह वह रुग्ण डीएनए प्रवाह था, जिसे प्रकृति आगे बढ़ाने के सर्वथा विरुद्ध थी, और दुर्योधन के अंत के साथ ही आदि-माता सत्यवती का रक्त-संबंधी वंश भी सदा के लिए समाप्त हो गया।

कुंती का आगमन और पारिवारिक एपिजेनेटिक मेमोरी का प्रवाह

जब प्रकृति ने ताड़ लिया कि कुरुवंश की संकीर्ण धारा में आनुवंशिक विष और अधर्म (Genetic Load) विनाशकारी स्तर पर पहुँच चुका है, तब उस व्यवस्था को पुनर्गठित करने के लिए कुंती रूपी एक अत्यंत सुदृढ़, शांत और अलौकिक पात्र का प्रवेश कराया गया। कुंती (पृथा) स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के कुल (यादव वंश) की थीं, जो जैविक रूप से अत्यंत सुदृढ़, प्रतिरोधी (Resilient) और संतुलित आचार-आहार-चेष्टा से युक्त थे। पाण्डु के जैविक अंशदान के अभाव में, कुंती ने देव-ऊर्जा के आह्वान (नियोग) से पुत्र प्राप्त किए। विज्ञान की भाषा में यह पुराने कुरुवंश के आनुवंशिक ह्रास को समाप्त कर उत्कृष्ट आनुवंशिक गुणों (Genetic Blueprints) को समाविष्ट करने की प्रक्रिया (Heterosis / Hybrid Vigor) थी। पांडवों में कुरुवंश का कोई आनुवंशिक विष संचित नहीं था।

यहाँ एक परम सूक्ष्म जैविक घटनाक्रम को समझना आवश्यक है। यद्यपि कुंती से लेकर आगे जनमेजय तक शांतनु के मूल कुरुवंश के वाई-क्रोमोसोम (Y-Chromosome) का असर और आनुवंशिक अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो चुका था, लेकिन पारिवारिक एपिजेनेटिक मेमोरी (Familial Epigenetic Memory) अभी भी पृष्ठभूमि में लगातार काम कर रही थी। कुंती ने जिन विकट परिस्थितियों, वनों के संघर्ष, हस्तिनापुर के षड्यंत्रों, लाक्षागृह के भयानक तनाव और कुरुवंश के भीतर फैले अधर्म के वातावरण को भोगा था, वह सारी परिवेशीय और सेलुलर स्मृति उनके जैविक तंत्र में गहराई तक अंकित थी।

क्वांटम भौतिकी और जीव विज्ञान के संधिकाल पर खड़े होकर जब इरविन श्रोडिंगर (Erwin Schrödinger) ने अपनी कालजयी पुस्तक 'What is Life?' में 'एपेरियोडिक क्रिस्टल' (Aperiodic Crystal Code) की अवधारणा दी थी, तब उन्होंने इसी सूक्ष्म आनुवंशिक कोडिंग की ओर संकेत किया था। जिसे हम सनातन चिंतन में संचित 'प्रारब्ध' या कर्मफल कहते हैं, वह वास्तव में यही अमूर्त क्रिस्टल कोड है, जो क्रोमोसोम बदल जाने या वाई-क्रोमोसोम का प्रभाव समाप्त हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता। वातावरण का यह संचित एपिजेनेटिक प्रभाव पीढ़ियों के डीएनए मार्क्स (Epigenetic Marks) के माध्यम से यात्रा करता है और क्रमिक रूप से परिष्कृत होता है। कुंती से शुरू हुई शुद्धीकरण की यह विधा इसी पारिवारिक एपिजेनेटिक मेमोरी को साफ करते हुए आगे बढ़ी, जिसे पूर्णतः विशुद्ध होने में सात पीढ़ियों का लंबा चक्र तय करना था।

शुद्धीकरण के तीन द्वार (The Genetic Filters)

कुंती से संचरित हुई इस पारिवारिक एपिजेनेटिक मेमोरी और संचित प्रभाव को पूरी तरह साफ करने के लिए प्रकृति ने आगे तीन महा-माताओं के माध्यम से कड़े फिल्टर लगाए।

प्रथमतः द्रौपदी (यज्ञ-वेदी की ऊर्जा) आईं, जिन्होंने पुराने प्रारब्ध और संचित कर्मों के विसर्जन का माध्यम बनकर अपने पाँचों पुत्रों की आहुति कुरुक्षेत्र में दे दी, जिससे पुराना आनुवंशिक ऋण वहीं समाप्त हो गया।

द्वितीय द्वार के रूप में सुभद्रा (यादव कुल की जीवनी शक्ति) का आगमन हुआ, जहाँ अर्जुन के उत्कृष्ट गांडीवधारी डीएनए और सुभद्रा के माध्यम से श्रीकृष्ण की जैविक निकटता का मिलन अभिमन्यु के रूप में हुआ, जिसने तंत्र को अदम्य साहस की सेलुलर मेमोरी दी।

तृतीय द्वार के रूप में उत्तरा (मत्स्य कुल) सामने आईं; जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़कर उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित पर प्रहार किया, तो वह कुरुवंश की भूमि से उपजे पुराने विष का अंतिम हमला था। श्रीकृष्ण ने गर्भ के भीतर उस आनुवंशिक उत्परिवर्तन को रीसेट (Genetic Mutation Reset) किया, जिससे पुराना संचित विष और बची हुई नकारात्मक पारिवारिक स्मृति पूरी तरह भस्म हो गई और एक परम शुद्ध बालक परीक्षित का जन्म हुआ।

सनातन विवाह पद्धति, सात पीढ़ियाँ और परम शुद्धीकरण का गणित

सनातन विवाह पद्धति में पाणिग्रहण एक संस्कार प्रतीक है, जहाँ भावी मातृ-पितृ सत्ता पवित्र अग्नि के सात फेरे मंत्रोच्चार के साथ लेते हैं। इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि इनके गुणसूत्र सात जन्मों (पीढ़ियों) तक पारिवारिक वृद्धि में साथ निभाएँगे। इसका संदर्भ गर्ग संहिता में श्रीराधा-कृष्ण के पाणिग्रहण संस्कार के समय का मिलता है, जहाँ महर्षि गर्ग ने ब्रह्मा जी द्वारा संपन्न कराए गए इस प्रसंग को इन पूर्ण श्लोकों के रूप में सीधे गद्य प्रवाह में अंकित किया है:

तदा स उत्थाय विधिहुताशनं प्रज्वाल्य कुण्डे स्थितयोस्तयोः पुरः । श्रुतेः करग्राहविधिं विधानतो विधाय धाता समवस्थितोऽभवत् ॥३१॥ स कारयामास हरिं च राधिकां प्रदक्षिणाः सप्त हिरण्यरेतसः । ततश्च तौ तं प्रणिमय्य वेदविद् तौ पाठयामास च सप्त मन्त्रकम् ॥३२॥ ततो वरेणोरसि राधिकाया करश्च संस्थाप्य वरेः करं पुनः । श्रीराधिकायाः किल पृष्ठदेशके संस्थाप्य मन्त्रांश्च विधिः प्रपाठयत् ॥३३॥ (गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड, १६.३१-३३)

हिरण्यरेतस (पवित्र अग्नि) के ये सात फेरे, वेदोक्त करग्राह विधि और सात मंत्र वास्तव में मानव जीवन में सात पीढ़ियों तक चलने वाले X-chromosome के क्रमिक क्षरण और माइटोकॉन्ड्रिया की मातृ-ऊर्जा के संतुलन का ब्रह्मांडीय प्रतीक हैं।

सत्यवती (१) की महत्वाकांक्षा से शुरू होकर, कुंती के जैविक प्रवेश और उनकी उस पारिवारिक एपिजेनेटिक मेमोरी के अदृश्य प्रवाह से होते हुए, सातवीं पीढ़ी के जनमेजय तक आते-आते यह आनुवंशिक इतिहास का पुराना ऋण (Epigenetic debt) और सेलुलर मेमोरी का विष घटकर १% से भी कम रह जाता है। इस बिंदु पर आकर पुराना कुरुवंश जैविक रूप से पूरी तरह विलीन (०%) हो जाता है। जनमेजय के रूप में एक बिल्कुल निष्पाप, परिष्कृत और नवीन प्रजाति (New Speciation) स्थापित होती है, जहाँ कुंती से चली आ रही वह पारिवारिक एपिजेनेटिक मेमोरी—वाई-क्रोमोसोम का असर बहुत पहले खत्म हो जाने के बावजूद—इस सातवीं पीढ़ी में आकर पूरी तरह विशुद्ध, शांत और रूपांतरित हो जाती है। यह नया वंश विशुद्ध रूप से यादव कुल और दिव्य चेतना की आनुवंशिकी पर आधारित था।

सर्प सत्र और इकोलॉजिकल बैलेंस की पूर्णाहुति (Systems Biology)

इस जैविक यात्रा का अंतिम तार्किक समापन जनमेजय के 'सर्प सत्र' (सर्प यज्ञ) पर होता है। परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के विष से हुई थी, जो कि कुरुवंश के पुराने संचित विष और दमित प्रारब्ध की अंतिम चोट थी। जनमेजय ने प्रतिशोध में आकर पृथ्वी से सर्पों की पूरी प्रजाति को समूल नष्ट करने का संकल्प लिया। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की भाषा में यह 'एब्सोल्यूट रेडिकलिज्म' (Absolute Radicalism) या एक आक्रामक 'साइटोकाइन स्टॉर्म' (Cytokine Storm) जैसी स्थिति थी, जहाँ तंत्र अपने ही वजूद के एक हिस्से को मिटाने पर उतारू हो जाता है।

तभी आस्तीक मुनि ने आकर जनमेजय के इस यज्ञ को विश्राम दिया। 'सिस्टम्स बायोलॉजी' (Systems Biology) का सबसे आधुनिक नियम यही है—'डायनेमिक इक्विलिब्रियम' (Dynamic Equilibrium) अर्थात् विष को पूरी तरह समाप्त नहीं करना है, बल्कि विष के साथ एक संतुलित सह-अस्तित्व बनाना है। यदि सारे सर्प नष्ट हो जाते, तो संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र (Ecological Balance) ढह जाता। आस्तीक मुनि द्वारा यज्ञ का रोका जाना ही कुरुवंश के आनुवंशिक शुद्धीकरण पर प्रकृति की अंतिम मुहर थी। यहाँ आकर पुराना प्रतिशोधात्मक विष विलीन हुआ और जनमेजय के रूप में एक संतुलित, लोक-कल्याणकारी और शांत चेतना का साम्राज्य स्थापित हुआ।

साक्षी चेतना का महा-सूत्र

महाभारत की यह जैविक परिणति कोई आकस्मिक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के उस शाश्वत विकासवादी आनुवंशिक नियम का जीवंत दृष्टांत है जो दर्शाता है कि स्थूल जीव-तंत्र और सूक्ष्म चेतना किस प्रकार एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। कुरुवंश का यह पूरा घटनाक्रम हमें समझाता है कि जब कोई व्यवस्था प्रकृति के मूलभूत नियमों से विमुख होकर अपने भीतर केवल रुग्णता और अशुद्धि का संचय करने लगती है, तब प्रकृति किसी यांत्रिक बल से नहीं, बल्कि एक गहरे संतुलनकारी नियम (Evolutionary Balancing Law) के तहत उसका परिष्कार करती है।

यह विमर्श किसी शुष्क अकादमिक सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं, बल्कि आधुनिक जीवविज्ञान के चश्मे से प्रकृति की उसी विराट शोधन-प्रक्रिया को और अधिक निकटता से समझने का एक दार्शनिक प्रयास है।

सामाजिक मुखौटे और राजनैतिक सिंहासन भले ही कुरुवंश के नाम पर चलते रहे, किंतु प्रकृति के सूक्ष्म जीव विज्ञान ने अधर्म और अशुद्धि को समूल नष्ट कर एक नए युग का सूत्रपात किया।

​— डॉ. अशोक तिवारी एवं प्रो. अरुण तिवारी