
प्रकृति के असीम विस्तार में, जब चेतना मौन होकर झाँकती है, तब विज्ञान और अध्यात्म के संगम पर एक नई यात्रा का जन्म होता है। यह उस अद्वैत संगम की मीमांसा है जहाँ भौतिक अन्वेषण और आंतरिक चेतना मिलकर जीवन को एक अनंत उत्सव में बदल देते हैं। यह इसी सत्य को उजागर करता है कि जीवन कोई ठहरा हुआ गंतव्य नहीं, बल्कि चेतना की एक सतत और आनंदमय यात्रा है।
जब हम इस धरा के हरे-भरे आँचल, पर्वतों की मूक गहराइयों और इस अनंत, नीले खुले आसमान के बीच खड़े होकर प्रकृति की इस असीम, जटिल और सुव्यवस्थित रचना को निहारते हैं, तो चेतना के किसी अज्ञात और अगाध कोने से एक शाश्वत प्रश्न स्वतःस्फूर्त उठ खड़ा होता है—इस विराट रचना का रचनाकार कौन है? कोई तो होगा, जिसकी इस सृजन के पीछे कोई अदृश्य, किंतु सर्वशक्तिमान और सृजनात्मक उंगली रही होगी। यह जिज्ञासा आधुनिक युग की देन नहीं है; यह वह आदिम, मौलिक और शाश्वत विस्मय है जिसने आदिकाल से मानव मन को झकझोर, मथ और जागृत किया है। जब हम इस संपूर्ण विषय और इस जीवंत विमर्श की गहराई में उतरते हैं, तो यह बात पूरी स्पष्टता के साथ उभरकर सामने आती है कि विज्ञान और आध्यात्मिकता दो विरोधी किनारे कतई नहीं हैं, बल्कि वे एक ही परम सत्य की दो अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ या भाषाएँ हैं।
यदि आध्यात्म इस पूरी ब्रह्मांडीय व्यवस्था की केंद्रीय 'धुरी' है, तो विज्ञान उस धुरी पर अनवरत घूमने वाला 'पहिया' है। स्थिर धुरी के बिना पहिए की कोई गति संभव नहीं है, और पहिए की गति के बिना धुरी अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर सकती। विज्ञान अपनी प्रयोगशालाओं, सूक्ष्म उपकरणों, और जटिल गणितीय समीकरणों के माध्यम से जिस बाहरी प्रकटीकरण को सिद्ध करता है, वही जब मनुष्य की आंतरिक चेतना में उतरता है, तो वह आध्यात्म का रूप ले लेता है। और जब अगले स्तर पर उस आंतरिक अनुभूति का कोई नया प्रकटीकरण बाहर की भौतिक चेतना में उतरता है, तो वह विज्ञान के लिए अगली छलांग की सीढ़ी बन जाता है, जो हमें और अधिक सूक्ष्म सत्यों और रहस्यों से परिचित कराती है।
यह यात्रा यहीं नहीं रुकती, क्योंकि विज्ञान की यात्रा और आध्यात्मिकता की समझ कभी भी स्थिर नहीं रही है। जैसे-जैसे मानव चेतना का विस्तार हुआ है, ऋषियों की आंतरिक दृष्टियाँ और वैज्ञानिकों के सिद्धांत दोनों लगातार विकसित हुए हैं। न तो अध्यात्म कोई रूढ़िवादी ढाँचा है और न ही विज्ञान किसी अंतिम सत्य की घोषणा है। विज्ञान जब अपनी भौतिक खोजों के जरिए किसी एक रहस्य को सुलझा लेता है, तो वह मनुष्य को किसी समाधान पर लाकर शांत नहीं करता, बल्कि उसे एक नए और भव्य विस्मय के द्वार पर लाकर खड़ा कर देता है। और वही नया विस्मय विज्ञान और अध्यात्म दोनों के लिए आगे की खोज, अन्वेषण और अनुसंधान का अगला विषय बन जाता है। यह एक ऐसा अंतहीन और गतिशील चक्र है जहाँ भौतिक अनुसंधान और आंतरिक चेतना एक-दूसरे को निरंतर समृद्ध करते रहते हैं।
इसी जीवंत प्रवाह में जब हम आधुनिक भौतिकी और क्वांटम यांत्रिकी के फलक पर दृष्टि डालते हैं, तो यह बात अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट होती है कि विज्ञान और अध्यात्म एक ही बिंदु पर आकर हाथ मिला लेते हैं। आज का विज्ञान यह स्वीकार करता है कि इस भौतिक जगत में कोई भी वस्तु अंतिम रूप से ठोस या स्थिर नहीं है। परमाणु के भीतर उतरने पर हमें केवल ऊर्जा के बंडल, तरंगें और उनका निरंतर स्पंदन मिलता है। स्ट्रिंग थ्योरी यह बताती है कि संपूर्ण ब्रह्मांड कुछ और नहीं, बल्कि ऊर्जा के सूक्ष्म तंतुओं का एक विराट संगीत है, एक अंतहीन नाद है। यदि हम अपनी प्राचीन वैदिक ऋचाओं और उपनिषदों की ओर देखें, तो ऋषियों ने इसी सत्य को शब्दों में ढाला था। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' का उद्घोष और नादब्रह्म की संकल्पना आधुनिक भौतिकी के उसी क्वांटम स्पंदन का दार्शनिक रूप है। जिसे विज्ञान 'एनर्जी फील्ड' या 'क्वांटम वैक्यूम' कहता है, प्राचीन मनीषियों ने उसी को 'चेतन महाकाश' कहा है। दोनों का गंतव्य एक ही है—पदार्थ के अहंकार को तोड़कर उसके मूल में छिपी हुई उस ऊर्जा या चेतना को खोजना जो हर कण में प्रवाहित हो रही है। इस प्रकार, विज्ञान प्रयोगशालाओं में जिस सत्य को गणितीय सूत्रों के जरिए सिद्ध करता है, वही जब एक साधु या वैज्ञानिक की आंतरिक चेतना में उतरता है, तो वह बौद्धिक ज्ञान न रहकर जीवंत अनुभूति बन जाता है, और यही अनुभूति आध्यात्मिकता का वास्तविक प्राण है।
यही 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा'—यानी उस परमसत्ता को जानने की तीव्र आकुलता—ही 'चरैवेति चरैवेति' की वास्तविक धुरी है। वेदों का यह उद्घोष किसी साधारण यात्रा का आह्वान नहीं है, बल्कि यह चेतना का वह शाश्वत नियम है जो जड़ता के विरुद्ध एक स्वाभाविक प्रतिकार है। जब तक मनुष्य के भीतर यह जिज्ञासा जीवंत है, तब तक उसके जीवन में कभी ठहरी हुई अवस्था आ ही नहीं सकती। जिज्ञासा ही वह आंतरिक चिंगारी है जो चेतना को कभी सुस्त या निष्क्रिय नहीं होने देती। विज्ञान भी तो इसी जिज्ञासा का दूसरा नाम है। एक सिद्धांत बनता है, वह प्रयोगों की कसौटी पर कसा जाता है, और फिर उस सिद्धांत की सीमाएं टूट जाती हैं। उस टूटने से जो शून्यता या नया प्रश्न पैदा होता है, वही विज्ञान को अगली छलांग लगाने के लिए प्रेरित करता है।
और जब यह खोज और अन्वेषण की यात्रा मात्र श्रम, दबाव या कर्तव्य न रहकर एक गहरे आनंद और उत्सव में रूपांतरित हो जाती है, तब कर्ता और कर्म का भेद मिट जाता है। जब तक किसी कार्य में अहंकार जुड़ा रहता है, तब तक वह श्रम रहता है और थकान पैदा करता है। लेकिन जब चेतना अपने मूल स्रोत से जुड़ जाती है, और कार्य एक स्वतःस्फूर्त उत्सव बन जाता है, तब कर्ता को स्वयं का भान भी नहीं रहता। जब अहंकार और स्वयं का भान पूरी तरह से मिट जाता है, तब श्रम का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। तब हमें यह समझ में आता है कि जीवन कोई ऐसी जड़ या बैठी हुई वस्तु नहीं है जिसे किसी मुकाम पर पाकर हमेशा के लिए ठहर जाना पड़े। समाज अक्सर जीवन को एक परीक्षा, एक गंतव्य या एक निश्चित पड़ाव के रूप में देखता है जहाँ सफलता या असफलता तय होती है, किंतु वास्तविकता इसके विपरीत है—यात्रा ही जीवन है।
अनुभव करने और समझने की यह यात्रा ही चेतना का वह विकास है जिसने मनुष्य को आदिम गुफाओं से निकालकर क्वांटम विज्ञान के इस अनंत आकाश तक पहुँचा दिया है। जब भीतर की जिज्ञासा बाहर के ब्रह्मांड से मिलती है, तो हर पड़ाव एक नया द्वार खोल देता है। जिस प्रकार नदी का जल एक ही स्थान पर रुक जाए तो वह सड़ जाता है, और यदि वह बहता रहे तो वह निर्मल और पवित्र बना रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव चेतना भी निरंतर गतिशीलता का नाम है। हर नया दिन एक नया तट है, हर नया अनुभव एक नया क्षितिज है, और हर नया विस्मय चेतना का एक नया विस्तार है। इस भौतिक जगत में इस असीम विस्मय, निरंतर गतिशीलता और आंतरिक आनंद की अवस्था से भव्य कोई दूसरा प्रसाद हो ही नहीं सकता।
चेतना ने जीवन को जन्म दिया और जीवन चेतना को समझने का प्रयास करने लगा। यह प्रयास जितना सघन होता गया, चेतना उतनी ही आगे बढ़ती गई। और इसी लुका-छिपी के कौतुक से अध्यात्म और विज्ञान के अंकुर फूटे—जहाँ एक ने भीतर की चेतना को ऊर्जा से सींचा, तो दूसरे ने बाह्य जगत को आलोकित किया। चेतना-जीवन का यह खेल उसी परम चेतना की एक कौतुक यात्रा बन गया। जब तक यह चेतना है, तब तक जीवन है, और यही निरंतर गतिशीलता ही जीवन है—चरैवेति चरैवेति।
— डॉ. अशोक तिवारी एवं प्रो. अरुण तिवारी
यात्रा ही जीवन है