जीव का भ्रम अकेलापन

जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर मनुष्य के मन में यह भाव अचानक उतर आता है कि वह इस संसार में अकेला है। भीड़भाड़ के इस कोलाहल के बीच भी एक असीम निर्जनता कई बार हमारे चारों ओर एक मौन दायरा खींच देती है। हमें ऐसा लगने लगता है जैसे हमारे सुख-दुख में कोई साझीदार नहीं है, और हम इस विराट ब्रह्मांड में एक ऐसी भटकती हुई इकाई हैं जिसका कोई निश्चित आकांक्षी नहीं है। लेकिन क्या वास्तव में मनुष्य कभी अकेला होता है? यदि हम अपनी दृष्टि के धुंधलेपन को हटाकर थोड़ा सा भी पीछे हटें और अपने होने के इस संपूर्ण परिदृश्य को देखें, तो यह भ्रम एक ही पल में छिन्न-भिन्न हो जाता है। हमें यह अहसास होता है कि यह ब्रह्मांड कभी किसी को अकेला छोड़ता ही नहीं; बल्कि हमारा अस्तित्व एक ऐसा महा-संयोग है जिसमें पूरी प्रकृति और हमारा अपना शरीर मिलकर हर पल एक अदृश्य यज्ञ रच रहे हैं।

​इस समग्रता की शुरुआत हमारे पैरों के नीचे पड़ी उस ठोस धरती से होती है, जो बिना किसी शर्त, बिना किसी अनुबंध और बिना किसी शोर के हमारे हर कदम का भार अपने ऊपर सहती है। वह हमें केवल खड़े होने की जगह ही नहीं देती, बल्कि अपने गर्भ में छिपे खनिजों से हमारा पोषण भी करती है। हमारे सिर के ऊपर यह खुला आसमान हमें असीम संभावनाओं और स्वतंत्रता का आकाश प्रदान करता है, जहाँ श्वास लेने के लिए हवा पेड़ों के पत्तों से छनकर हमारे फेफड़ों में उतरती है। वे मूक पौधे, जो हमारे किसी आदेश के बिना धूप को खींचकर हमारे लिए प्राण-वायु छोड़ते हैं और धरती की कोख से अन्न उपजाते हैं, हमारे सबसे पहले और सबसे गहरे सहयात्री हैं।

​इस पूरे विधान में जो सबसे विस्मयकारी है, वह है देने वाले की वह सहजता, करुणा और निर्मलता। धरती, हवा, जल और आकाश—इनमें से किसी के पास भी देने के पीछे कोई हिसाब-किताब या स्वार्थ नहीं होता। सूरज बिना किसी भेदभाव के अपनी धूप बिखेरता है, नदियाँ बिना किसी अपेक्षा के हमारी प्यास बुझाती हैं, और पेड़ बिना किसी शर्त के अपनी छांव और प्राण-वायु हमें सौंप देते हैं। यह प्रकृति की वह परम निर्मल करुणा है जो केवल देना जानती है, माँगना नहीं।

​जब हम इस निःस्वार्थ और असीम दान को अपनी आँखों से देखते हैं, तो मन में एक अगाध कृतज्ञता और अहोभाव का ज्वार उठना स्वाभाविक हो जाता है। हम यह महसूस करते हैं कि हमारा यह जीवन हमारा अपना अकेला गढ़ा हुआ नहीं है, बल्कि यह अनगिनत अदृश्य हाथों और तत्वों के उपहार से सींचा गया है। इस महा-अनुष्ठान को देखकर हमारे भीतर एक ऐसा कर्ज का भाव जन्म लेता है, जो किसी बंधन या बोझ का नहीं, बल्कि एक गहरे अपनेपन, श्रद्धा और समर्पण का भाव होता है। हम यह समझ जाते हैं कि हम पर इस पूरी प्रकृति का एक ऐसा ऋण है, जिसे हम चुका नहीं सकते, बस कृतज्ञता से भर सकते हैं।

​बाहर फैली इस प्रकृति से भी अधिक गहन और करुणा से भरा सत्य हमारे भीतर चल रहा है। जिस शरीर को हम अपना एकांत और निजी 'स्वयं' मानकर चलते हैं, वह वास्तव में किसी का एकाधिकार नहीं है, बल्कि बाहर के ही तत्वों का एक अद्भुत संघनन है। हमारे भीतर हृदय एक सेकंड के लिए भी विश्राम किए बिना रक्त को पंप कर रहा है, फेफड़े निरंतर हवा को छानकर ऊर्जा दे रहे हैं, और तंत्रिका तंत्र हर बारीक संवेदना को मस्तिष्क तक पहुँचा रहा है। यह शरीर कोई जड़ मशीन नहीं है, बल्कि प्रकृति की ऊर्जा का एक सूक्ष्म और जीवंत रूप है। अरबों कोशिकाएँ हर पल जन्म ले रही हैं, पुरानी विदा हो रही हैं, यकृत विषैले तत्वों को छान रहा है और वृक्क रक्त को शुद्ध कर रहे हैं—यह सब बिना हमारी किसी सचेत कोशिश के, केवल हमारे जीवित रहने की जिद के साथ अनवरत चल रहा है। जब हमारे अपने ही भीतर का यह सूक्ष्म संसार हमारी सेवा में दिन-रात महायज्ञ में जुटा है, तब हम कैसे कह सकते हैं कि हम अकेले हैं?

​यह विचित्र सत्य जब पूरी तरह से खुलता है, तब कायनात का हर जर्रा इस बात की गवाही देता है कि हमारा शरीर और बाहर की दुनिया दो अलग छोर नहीं हैं। हमारे शरीर की हड्डियाँ इस धरती के पत्थरों और खनिजों का ही विस्तार हैं, हमारे भीतर का अधिकांश भाग उसी जल से सिंचित है जो नदियों और समुद्रों में लहरा रहा है, और हमारे शरीर का तापमान उसी सूर्य की ऊर्जा का एक अंश है जो आकाश में चमक रहा है। बाहर जो महासागर बह रहा है, वही सूक्ष्म रूप में हमारी धमनियों में प्रवाहित है। यहाँ कोई भेद ही नहीं है कि 'हम' कहाँ समाप्त होते हैं और 'प्रकृति' कहाँ से शुरू होती है।

​जब मनुष्य इस आंतरिक और बाहरी सहयोग के सत्य को, इस सहज करुणा और अहोभाव को गहराई से आत्मसात कर लेता है, तब अकेलापन एक गहरे मौन और असीम शांति में बदल जाता है। वह एकांत जो कभी भय या खालीपन का अहसास कराता था, वह अब ब्रह्मांड के साथ एकरूप होने का आनंद बन जाता है। जरा सोचिए—जिस धरती पर हमारे पैर टिके हैं, जो आकाश हमारे सिर पर तना है, जिस हवा से हमारे प्राण चल रहे हैं, और जिस जल से हमारी प्यास बुझती है—वे सब पल-पल हमारा बे-मोल साथ निभा रहे हैं। दूसरी ओर, हमारे भीतर बैठी अरबों कोशिकाएँ, हमारा मूक हृदय और निरंतर जागृत प्राण-तंत्र बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी अनुबंध के केवल हमारे जीवित रहने की जिद में दिन-रात महायज्ञ में जुटे हैं। जब बाहर का ब्रह्मांड और भीतर का यह सूक्ष्म संसार दोनों मिलकर जीव को बिना किसी मूल्य के अपना सब कुछ सौंप रहे हैं, तो फिर इस विराट परिवार में अकेलापन कैसा? यह अकेलापन केवल एक दृष्टिदोष है, और जैसे ही दृष्टि करुणा और कृतज्ञता से साफ होती है, यह अकाट्य सत्य प्रकट हो जाता है कि जीव कभी भी, कहीं भी अकेला नहीं है।

__कौन कहता है कि हम तन्हा और बेसहारा हैं,

जब हर साँस में गूँज रहा कायनात का तारा है_ !_

— डॉ. अशोक तिवारी