
« अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते » — (श्रीमद्भगवद्गीता 10.8)
सदियों से हमें यह सिखाया गया है कि जीवन का सर्वोच्च सत्य 'कमल का पत्ता' बनना है—संसार में रहो, लेकिन पानी की एक बूंद भी अपने ऊपर टिकने मत दो। उपदेशों, ग्रंथों और दार्शनिक आदर्शों ने हमें हमेशा यही सिखाया कि ज्ञानी वही है जो पूरी तरह निर्लिप्त, अछूता और तटस्थ रहे। लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों से बाहर निकलकर जीवन के धरातल पर उतरते हैं, तो एक ऐसा सच सामने आता है जो इन आदर्शों के एकांत को थोड़ा और विस्तृत कर देता है।
यही यथार्थ जब हमारे प्राचीन महाकाव्यों के मुख्य पात्रों पर टिकता है, तो भ्रम की परतें खुद-ब-खुद उधड़ने लगती हैं। चाहे वह रणक्षेत्र में गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण हों या मोह से कांपने वाले अर्जुन, यह साफ हो जाता है कि कोई भी कभी सचमुच 'निर्लिप्त' नहीं रह पाया है। अर्जुन का विषाद और अंततः अपनों के नाश पर टूट जाना यह बताता है कि वे मानवीय संवेदनाओं के समंदर में डूबे हुए थे। और वही कृष्ण, जिन्होंने निष्काम कर्म का पाठ पढ़ाया, वे भी जीवन के अंतिम पड़ाव पर गांधारी के शाप, यदुवंश के आपसी संहार और एक साधारण शिकारी के तीर से प्राण त्यागने की विवशता से बच नहीं पाए। जब प्राण और शरीर का यह ढांचा साथ रहता है, तो अंततः हर कृष्ण को अपनी चेतना के उस मुहावरे से उतरकर अर्जुन की उस कच्ची और संघर्ष भरी मिट्टी में आना ही पड़ता है, जहाँ दर्द और विवशता ही असली सच होती है।
यह विवशता केवल भारतीय दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव इतिहास का साझा सत्य है। यदि हम वैश्विक संस्कृतियों और इतिहास के अन्य आयामों पर दृष्टि डालें, तो यही भाव अलग-अलग सभ्यताओं के महानायकों के जीवन में भी पूरी तल्लीनता से उभरकर आता है। यूनानी महाकाव्य के अमर नायक ओडिसियस (Odysseus) को ही लें—ट्रोजन युद्ध की जीत के बाद समुद्र के तूफानों और भयंकर बाधाओं के बीच उनका भटकना केवल भूगोल की यात्रा नहीं थी, बल्कि अपनों के बिछोह, अताह अकेलेपन और अंतहीन आंसुओं से जूझने की एक लंबी मानवीय दास्तान थी। वे अपनी असाधारण बुद्धि के बावजूद भीतर से उतने ही टूटे और कातर थे, जितने आम इंसान होते हैं।
इसी प्रकार, रोमन सम्राट और महान दार्शनिक मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'मेडिटेशन्स' में जिस 'Stoicism' यानी ब्रह्मांडीय तटस्थता और संयम का पाठ पढ़ाया, उनका अपना निजी जीवन उसके बिल्कुल विपरीत झंझावातों से घिरा था। साम्राज्य के भयंकर युद्ध, महामारियों का प्रकोप और अपनों की मृत्यु के असहनीय दुखों ने उनके उस दार्शनिक कवच को बार-बार झकझोरा; वे भीतर से मानवीय पीड़ा के थपेड़ों से गहरे आहत थे।
सुदूर पूर्व के प्राचीन चीनी दर्शन में, ताओ धर्म के संस्थापक लाओत्सु (Lao Tzu) ने जिस 'जल की सहजता' का मार्ग सुझाया, वह भी किसी कठोर वैराग्य का नहीं, बल्कि जीवन के प्राकृतिक प्रवाह के साथ बह जाने और उसकी विवशताओं को पूरी विनम्रता से गले लगाने का ही दूसरा नाम था।
यहाँ तक कि जीवन भर संसार को विरक्ति और संन्यास का पाठ पढ़ाने वाले गौतम बुद्ध भी अपने भीतर के मानवीय बंधनों से पूरी तरह अछूते नहीं रह सके; वे महाज्ञान और संन्यासी जीवन के शिखर पर होने के बावजूद अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल के प्रति उपजे उस आत्मीय खिंचाव को नकार नहीं पाए और अंततः उन्हें अपने जीवन के दायरे में जगह दी ही। और विडंबना देखिए कि जीवन भर मोह-माया से परे रहने का उपदेश देने वाले उसी बुद्ध के प्राण छूटने पर, उनका अंतिम संस्कार भी किसी साधारण संन्यासी की तरह नहीं, बल्कि एक चक्रवर्ती सम्राट के राजसी ढंग से किए जाने का आग्रह जुड़ा रहा—जो यह बताता है कि शरीर और परंपरा के संस्कार अंतिम क्षण तक पीछा नहीं छोड़ते।
ठीक यही हाल दुनिया को अपनी तलवार के दम पर जीतने वाले महान विजेता सिकंदर (Alexander) का भी रहा। मृत्यु की देहरी पर खड़े होकर उस अजेय सम्राट का वह अहंकार और विश्व-विजय की महत्वाकांक्षा एक पल में बिखर गई। अंत समय में उसकी वह प्रसिद्ध इच्छा कि उसकी हथेलियाँ ताबूत से बाहर खाली खुली रखी जाएँ ताकि दुनिया यह देख सके कि सब कुछ जीतने वाला भी खाली हाथ ही विदा होता है, इस शाश्वत सत्य को रेखांकित करती है कि मनुष्य चाहे किसी भी ऊंचाई पर पहुँच जाए, अंततः वह जीवन की इस कच्ची मिट्टी और उसकी विवशताओं के सामने कितना लाचार होता है। मनुष्य चाहे ग्रीक हो, रोमन हो, एशियाई हो या कोई विश्व-विजेता—इतिहास गवाह है कि पूर्ण तटस्थता का कोई भी बुर्ज ऐसा नहीं है जो मानवीय संवेदनाओं और अंतर्विरोधों के आंधी-तूफान को रोक सका हो।
इस मानवीय विवशता को जब हम आधुनिक विकासवादी जीवविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान के चश्मे से देखते हैं, तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि संवाद का यह लचीलापन और अनुकूलनशीलता कोई त्रुटि नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का जैविक आधार है। मस्तिष्क का नियोकोर्टेक्स इसलिए विकसित हुआ ताकि हम जटिल सामाजिक समूहों में रह सकें। मस्तिष्क शरीर का एक छोटा हिस्सा होने के बावजूद कुल ऊर्जा का बड़ा हिस्सा खपत करता है; अतः हर बात पर निर्मम सत्य बोलना और हर स्थिति में पूरी कठोरता से पेश आना मस्तिष्क के लिए अत्यधिक ऊर्जा-खपाने वाली प्रक्रिया है। विकास के क्रम में मस्तिष्क ने ऊर्जा बचाने और रिश्तों को सुचारू रखने के लिए 'अनुकूलनशीलता' को चुना, और दैनिक जीवन का शिष्टाचार उसी जैविक आवश्यकता का परिणाम है।
इसी निरंतरता में, जीवन का वास्तविक और जीवंत प्रतीक कमल नहीं, बल्कि कुमुदिनी (लिली) बन जाता है। लिली का पत्ता पानी की सतह पर पूरी तरह लेटा रहता है, लहरों के साथ ऊपर-नीचे होता है, जल के थपेड़ों को अपनी पूरी तीव्रता से महसूस करता है, लेकिन फिर भी अपनी सहजता और विश्वास के बल पर डूबता नहीं है; वह पानी से भागता नहीं, बल्कि उसके साथ जीता है।
जब हम अपनी इन कमजोरियों, अपनी विवशताओं और इस कच्ची मिट्टी के साथ खुद को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, तभी जीवन अपनी पूरी प्रामाणिकता और सुंदरता के साथ सामने आता है। सत्य केवल शब्दों का आग्रह नहीं है, बल्कि जीवन की उस आत्मीय स्वीकारोक्ति का नाम है जो हमें भीतर से हल्का, सच्चा और करुणावान बना देती है। सत्य का अर्थ जीवन से लड़ना नहीं, बल्कि उसे उसकी संपूर्ण विवशताओं और सुंदर संभावनाओं के साथ गले लगाना है।
जब हम इस विराट ब्रह्मांड और उसकी रची हुई लीला को देखते हैं, तो एक गहरा दार्शनिक सत्य उभरकर सामने आता है—कमल का पत्ता उस निर्विकार, अलिप्त और परम ब्रह्म का ही प्रतीक हो सकता है, जो इस सृष्टि के परे रहकर भी इसमें है। वह जल में रहता है, किंतु जल से अछूता रहता है, क्योंकि उसकी प्रकृति ही संपूर्ण अनासक्ति की है।
किंतु हम जो साधारण मनुष्य हैं, हमारा जीव रूप है, वह उस जल में तैरती हुई 'कुमुदिनी' की तरह है—जो हर लहर के साथ कांपती है, जल के थपेड़ों को अपनी पूरी तीव्रता से महसूस करती है और अपने पूरे मानवीय अस्तित्व के साथ उस जल में जीती है। कुमुदिनी पानी से भागती नहीं, बल्कि उसके हर स्पंदन को अपनी चेतना में स्वीकार करती है।
और सबसे बड़ा विस्मय तो यह है कि जब उस परम चेतना ने भी इस धरातल पर मानव रूप में अवतार लिया, तो उन्होंने भी उस कठोर और असंभव 'कमल' बनने के बजाय 'कुमुदिनी' की तरह ही इस जीवन को जिया। वे हँसे भी, रोए भी, अपनों के मोह में टूटे भी, युद्ध के संकट में कांपे भी, और अंततः जीवन की उस पूरी जैविक व मानवीय नियति को पूरी सहजता के साथ स्वीकार किया।
जीवन कोई ऐसा दुर्ग नहीं है जहाँ संवेदनाओं के प्रवेश पर पाबंदी हो; जीवन तो उस कुमुदिनी की तरह बहने, कांपने और खिलने का नाम है, जो हर आंधी और हर लहर के बीच अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है।
— डॉ. अशोक तिवारी
कुमुदिनी सा जीवन